विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय इक्विटी मार्केट में एक बार फिर खरीदारी शुरू कर दी है। जुलाई और अगस्त की शुरुआत में, उन्होंने हेल्थकेयर और कंज्यूमर जैसे स्टेबल सेक्टर्स में पैसा लगाया है, जबकि कैपिटल गुड्स और टेलीकॉम जैसे साइक्लिकल सेक्टर्स से पैसा निकाला है।
FPIs ने बदली रणनीति: जुलाई-अगस्त में निवेश का फोकस बदला
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार में अपनी रणनीति बदल दी है। कई महीनों की बिकवाली के बाद, वे अब शुद्ध खरीदार बन गए हैं। जुलाई 2026 में, FPIs ने भारतीय बाजार में करीब ₹20,200 करोड़ का निवेश किया, जिससे चार महीने की बिकवाली का सिलसिला थम गया। अगस्त के पहले पखवाड़े में भी यह खरीदारी का रुख जारी रहा और ₹16,621 करोड़ और बाजार में आए।
किन सेक्टर्स में लगा रहे पैसा?
यह निवेश एक स्पष्ट सेक्टर रोटेशन को दर्शाता है। पैसा उन उद्योगों की ओर गया है जो आर्थिक अनिश्चितता के प्रति अधिक लचीले माने जाते हैं। कंज्यूमर सर्विसेज में सबसे ज्यादा ₹10,201 करोड़ का इनफ्लो देखा गया, इसके बाद हेल्थकेयर में ₹7,731 करोड़ और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में ₹7,342 करोड़ का निवेश हुआ। निवेशक स्थिरता की तलाश में दिख रहे हैं, और ऐसे स्टॉक्स पसंद कर रहे हैं जो आवश्यक सेवाएं या उत्पाद प्रदान करते हैं, जो वैश्विक वित्तीय अस्थिरता के समय में बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
किन सेक्टर्स से पैसा निकाला?
जहां कुछ सेक्टर्स ने निवेश आकर्षित किया, वहीं कुछ में बिकवाली का भारी दबाव भी देखा गया। जुलाई में FPIs ने कैपिटल गुड्स से ₹6,275 करोड़ और टेलीकम्युनिकेशंस सेक्टर से ₹5,725 करोड़ निकाले। पावर कंपनियों से भी ₹2,863 करोड़ की शुद्ध निकासी हुई। इससे पता चलता है कि निवेशक वर्तमान में साइक्लिकल और बड़े प्रोजेक्ट-आधारित उद्योगों में अपना एक्सपोजर कम कर रहे हैं, जो अक्सर आर्थिक वृद्धि और सरकारी खर्च के चक्रों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
फाइनेंशियल सर्विसेज, जो आमतौर पर FPI पोर्टफोलियो का सबसे बड़ा हिस्सा होता है, जुलाई में मिश्रित रुझान दिखा। शुरुआती खरीदारी के बावजूद, महीने के अंत में इस सेक्टर से ₹694 करोड़ की शुद्ध निकासी हुई, जो बड़े, अर्थव्यवस्था से जुड़े वित्तीय स्टॉक्स के प्रति सावधानी को दर्शाता है।
लंबी अवधि का परिदृश्य
हालांकि हालिया इनफ्लो सकारात्मक हैं, निवेशकों के लिए बड़े परिदृश्य को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। पूरे 2026 फाइनेंशियल ईयर के लिए, FPIs अभी भी शुद्ध बिकवाल बने हुए हैं, जिनकी कुल निकासी लगभग ₹2.4 लाख करोड़ है। हालिया सुधार के पीछे भारत में मजबूत कॉर्पोरेट अर्निंग्स, संभावित अमेरिकी ब्याज दर में कटौती की उम्मीदें और हालिया करेक्शन के बाद आकर्षक हुए वैल्यूएशन जैसे कारक हैं।
निवेशकों को वैश्विक कारकों पर नजर रखनी चाहिए जो इन फ्लो को प्रभावित करते हैं। भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अमेरिकी डॉलर की मजबूती प्राथमिक जोखिम बने हुए हैं। यदि वैश्विक बाजारों को फिर से अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है या यदि भारतीय बाजार का वैल्यूएशन बहुत तेजी से बढ़ता है, तो यह हालिया इनफ्लो की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। भविष्य की बाजार दिशा संभवतः इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को कैसे संभालते हैं और रुपये की स्थिरता कैसी रहती है, ये दोनों ही FPI के निर्णय लेने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
