पिछले एक दशक में FCRA-रजिस्टर्ड NGO की संख्या घटकर **14,466** रह गई है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह **₹22,974 करोड़** तक पहुंच गया है। सरकार अब नए कानून पर विचार कर रही है जो NGO की संपत्तियों पर सख्त नियंत्रण ला सकता है।
भारत में विदेशी चंदे के नियमों में पिछले एक दशक में बड़ा बदलाव आया है। संसद की संयुक्त समिति (Joint Committee) के सामने पेश आंकड़ों के मुताबिक, FCRA के तहत रजिस्टर्ड सक्रिय NGO की संख्या 29,022 से घटकर 14,466 रह गई है। इस भारी गिरावट के पीछे मुख्य वजह सख्त अनुपालन नियम और एडमिनिस्ट्रेटिव बदलाव हैं। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि 91% लाइसेंस रद्दीकरण का कारण एनुअल रिटर्न न भर पाना रहा है।
फंडिंग में उछाल और कंसोलिडेशन
हालांकि सक्रिय NGO कम हुए हैं, लेकिन विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ा है। फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में विदेशी योगदान ₹22,974 करोड़ रहा, जो 2015-16 में ₹17,832 करोड़ था। यह दर्शाता है कि अब फंडिंग बड़े और अनुपालन में सक्षम संगठनों के पास केंद्रित हो रही है। अमेरिका ₹12,113 करोड़ के योगदान के साथ सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है, जबकि दिल्ली में सबसे ज्यादा ₹5,834 करोड़ की फंडिंग प्राप्त हुई है।
अनचाही चिंता: बेकार पड़ा पैसा
रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग ₹35,968 करोड़ की राशि अभी भी बिना खर्च किए पड़ी है, जिसका एक बड़ा हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट में रखा गया है। यह फंड के बेहतर इस्तेमाल और NGO की परिचालन क्षमता पर सवाल खड़े करता है।
नए कानून पर घमासान
फिलहाल, सरकार एक प्रस्तावित अमेंडमेंट बिल पर काम कर रही है। सरकार का तर्क है कि पारदर्शिता के लिए सख्त निगरानी जरूरी है, जिसमें लाइसेंस रद्द होने पर NGO की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान भी शामिल है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि ये उपाय दंडात्मक हैं और खास तौर पर अल्पसंख्यक संस्थानों को प्रभावित कर सकते हैं। अब सबकी नजरें विंटर सेशन से पहले आने वाली कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो भविष्य के कड़े नियमों की दिशा तय करेगी।
