क्या है पूरा मामला?
Food Corporation of India (FCI) इन दिनों आलोचनाओं से घिरी हुई है। आरोप है कि देश के अनाज भंडारण इंफ्रास्ट्रक्चर (Grain Storage Infrastructure) के आधुनिकीकरण प्रोजेक्ट में एक तरह का प्राइवेट-सेक्टर डुओपॉली (Private-Sector Duopoly) बन गया है। इस विवाद की जड़ है सरकार का ₹20,000 करोड़ का "Hub and Spoke" साइलो इनिशिएटिव, जिसका मकसद पुराने और नुकसानदायक स्टोरेज तरीकों को बदलकर हाई-एफिशिएंसी वाले स्टील साइलो (Steel Silos) लगाना है। आलोचकों का कहना है कि एंटी-मोनोपॉली क्लॉज (Anti-Monopoly Clause) जैसे सुरक्षा उपायों को हटाने से दो बड़ी प्राइवेट कंपनियों - Adani Agri Logistics Ltd और Leap India Food & Logistics Pvt Ltd - को कॉन्ट्रैक्ट का बड़ा हिस्सा मिल गया है।
आंकड़ों की सच्चाई
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इन दोनों कंपनियों ने प्रोजेक्ट के दो फेज में कुल 134 में से 110 साइलो कॉन्ट्रैक्ट हासिल किए हैं, जिनकी कुल कीमत ₹16,500 करोड़ से ज्यादा है। यह लगभग 46.5 लाख मीट्रिक टन अनाज भंडारण क्षमता को कंट्रोल करता है, जो इस प्रोजेक्ट की कुल 60 लाख मीट्रिक टन क्षमता का एक बड़ा हिस्सा है। यह मामला मई 2022 के उस फैसले से जुड़ा है जब पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप एप्राइजल कमेटी (PPPAC) ने एंटी-मोनोपॉली क्लॉज को हटाने की वकालत की थी। FCI का कहना है कि Adani को फेज II में कुछ सेग्मेंट्स में जीत नहीं मिलना प्रक्रिया की ईमानदारी साबित करता है, लेकिन मार्केट एनालिस्ट्स का मानना है कि टेंडर बंडलों का बड़ा साइज़ ही बड़ी कंपनियों के पक्ष में था।
जोखिम और चिंताएं
ऑल इंडिया किसान सभा (AIKS) जैसे संगठन इस स्ट्रक्चर को पब्लिक फंड से चलने वाले प्राइवेट ऑपरेटर्स के लिए 'लॉन्ग-टर्म प्रॉफिट गारंटी' बता रहे हैं। इससे कृषि क्षेत्र में 'प्रिडेटरी एक्युमुलेशन' (Predatory Accumulation) का खतरा बढ़ सकता है, जहां कुछ प्राइवेट प्लेयर्स राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर में जड़ें जमा लेंगे। इसके अलावा, लीज इंडिया जैसी कंपनियों में फॉरेन प्राइवेट इक्विटी (Foreign Private Equity) के निवेश को देखते हुए, विदेशी-समर्थित संस्थाओं द्वारा ऑपरेशनल कंट्रोल की चिंता भी जताई जा रही है। 30 साल के कन्सेशन एग्रीमेंट्स (Concession Agreements) पर भी सवाल उठ रहे हैं, जो सरकार को फिक्स्ड पेमेंट्स के लिए बांध सकते हैं।
आगे क्या?
आधुनिक साइलो टेक्नोलॉजी अनाज के नुकसान को कम करने और बेहतर निगरानी में मदद करती है। हालांकि, इन पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप्स (PPPs) का गवर्नेंस एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। टेंडर की शर्तों के पीछे के फैसले पर संसदीय जांच की मांग बढ़ रही है। जब तक सरकार बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की गति और विविध लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम के बीच संतुलन बनाने के बारे में स्पष्टता नहीं देती, यह प्रोजेक्ट राजनीतिक और आर्थिक बहस का मुद्दा बना रहेगा।
