26 अगस्त, 2026 को नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड्स के बाद, एक्सपर्ट्स ने हिमालयन बेल्ट में 'मल्टी-हज़ार्ड असेसमेंट' अनिवार्य करने की वकालत की है। यह बदलाव हिमालय में स्थित पावर प्लांट्स और हाईवेज जैसी बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए रेगुलेटरी और ऑपरेशनल चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
हिमालय में बढ़ती आपदाओं की घटनाओं के चलते जियोलॉजिस्ट्स और पॉलिसी मेकर्स अब आपदा प्रबंधन के लिए नई रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। Geological Survey of India (GSI) के अधिकारी अब अलग-अलग खतरों के बजाय 'मल्टी-हज़ार्ड असेसमेंट' फ्रेमवर्क को अपनाने पर जोर दे रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि कैसे ग्लेशियर पिघलने या बर्फीले तूफानों जैसी घटनाएं आपस में जुड़कर बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकती हैं।
कंपनियों के लिए क्या हैं रिस्क?
हिमालयी क्षेत्र में मौजूद कैपिटल-इंटेंसिव प्रोजेक्ट्स, जैसे हाइड्रोपावर प्लांट, नेशनल हाईवेज और ट्रांसमिशन लाइन्स पर अब खतरा मंडरा रहा है। मौजूदा रिस्क मॉडल पुरानी तकनीकों पर आधारित हैं, जो 'कैस्केडिंग' यानी एक घटना से दूसरी घटना के जुड़ाव को नहीं देख पाते। भविष्य में रेगुलेटरी बॉडीज कड़े सुरक्षा मानक तय कर सकती हैं, जिससे कंपनियों का कैपेक्स (Capex) यानी खर्च बढ़ना तय है। इसके अलावा, हाई-रिस्क जोन के लिए इंश्योरेंस प्रीमियम और रियल-टाइम मॉनिटरिंग तकनीक का खर्च भी मुनाफे पर दबाव डाल सकता है।
प्रोएक्टिव रिस्क मैनेजमेंट की ओर कदम
पुराने अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम अब इन जटिल घटनाओं के सामने नाकाफी साबित हो रहे हैं। एक्सपर्ट्स अब सैटेलाइट डेटा और ग्राउंड-लेवल सेंसर्स को जोड़ने की सलाह दे रहे हैं। सिक्किम सरकार ने पहले ही 13 सितंबर, 2026 को ग्लेशियर से जुड़े रिस्क को मैनेज करने के लिए एक 8-सूत्रीय योजना का ऐलान किया है। अब निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी होगी जो अपने प्रोजेक्ट डिजाइन और इमरजेंसी प्रोटोकॉल को नए मानकों के मुताबिक ढाल रही हैं। ध्यान रहे, इन खतरों को नजरअंदाज करना अब कंपनियों के एसेट और लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी के लिए महंगा पड़ सकता है।
