Equirus Wealth Management की एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत के अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ (UHNW) परिवारों में दो-तिहाई पति महत्वपूर्ण इन्वेस्टमेंट फैसलों में अपनी पत्नियों को शामिल नहीं करते हैं। यह पुरुष-प्रधान फैसला लेने की प्रक्रिया भविष्य की वेल्थ गवर्नेंस के लिए बड़ा रिस्क पैदा कर रही है।
फैसले लेने में आधी-अधूरी भागीदारी
रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही 70% महिलाएं मानती हैं कि उनके पास कुछ हद तक अधिकार हैं, लेकिन असलियत यह है कि निवेश से जुड़े बड़े फैसले अभी भी पुरुषों के हाथों में ही केंद्रित हैं। सिर्फ 30% पुरुष ही बड़े इन्वेस्टमेंट डील्स या प्राइवेट मार्केट के अवसरों पर अपनी पत्नियों से चर्चा करते हैं।
क्यों है यह एक बड़ा रिस्क?
यह असंतुलन सिर्फ एक घरेलू मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है। डेटा बताता है कि 40% महिलाएं किसी बड़ी जीवन घटना, जैसे परिवार के मुखिया की मृत्यु या विरासत के बंटवारे के बाद ही अचानक से वेल्थ मैनेजमेंट की कमान संभालती हैं। बिना पहले से तैयारी के ऐसी जटिल वित्तीय जिम्मेदारी उठाने से परिवार की संपत्ति को नुकसान होने का खतरा बना रहता है।
प्रोफेशनल वेल्थ गवर्नेंस की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय फैमिली ऑफिस अब प्रोफेशनल हो रहे हैं, ऐसे में जेंडर-इनक्लूसिव गवर्नेंस बहुत जरूरी है। जब परिवार की पूरी वेल्थ सिर्फ एक ही व्यक्ति के फैसले पर टिकी होती है और दूसरे पक्ष को जानकारी नहीं होती, तो अचानक आई मुसीबतें वेल्थ इरोशन (संपत्ति का क्षरण) का कारण बन सकती हैं। आने वाले समय में वही परिवार अपनी संपत्ति सुरक्षित रख पाएंगे जो निवेश प्रक्रिया में सभी सदस्यों को शुरू से ही भागीदार बनाएंगे और इस जिम्मेदारी को इंस्टीट्यूशनलाइज करेंगे।
