पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने कहा है कि Election Commission of India की साख उसके वर्तमान नेतृत्व के फैसलों पर टिकी है। अशोक लवासा के साथ मिलकर उन्होंने संस्था से पारदर्शिता बढ़ाने और जनता के भरोसे को मजबूत करने का आग्रह किया है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने हाल ही में Election Commission of India के वर्तमान नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। रावत ने स्पष्ट किया कि संस्था की विश्वसनीयता सीधे तौर पर मौजूदा तीन आयुक्तों—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार और चुनाव आयुक्त एस.एस. संधू तथा विवेक जोशी—के फैसलों पर निर्भर करती है। उन्होंने जोर दिया कि संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते हुए जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए नेतृत्व का पारदर्शी संचार अनिवार्य है।\n\nयह चर्चा हाल ही में सामने आई उस आंतरिक घर्षण की रिपोर्टों के बाद तेज हुई है, जिसमें 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न' (Special Intensive Revision) की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी प्रक्रिया सर्वसम्मति से मंजूर की गई थी और इसे Supreme Court of India द्वारा भी सही ठहराया गया है। आयोग का कहना है कि प्रशासनिक पत्राचार को आंतरिक मतभेद के रूप में गलत तरीके से समझा गया।\n\nभारतीय निवेशकों के लिए, संवैधानिक संस्थाओं की स्थिरता मैक्रो इकोनॉमिक माहौल का आधार होती है। स्पष्ट गवर्नेंस और अनुमानित नियामक प्रक्रियाएं अनिश्चितता को कम करती हैं, जिसे निवेशक जोखिम आकलन के दौरान ध्यान में रखते हैं। जबकि आयोग ने अपनी प्रक्रियाओं को संवैधानिक बताया है, पूर्व आयुक्तों द्वारा सार्वजनिक संवाद की मांग यह दर्शाती है कि संस्थागत निर्णयों में स्पष्टता का प्रीमियम कितना अधिक है।\n\nपूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी कहा है कि मौजूदा 'ट्रस्ट डेफिसिट' (trust deficit) को पाटने के लिए जन-संवाद अत्यंत जरूरी है। अब बाजार के जानकार और ऑब्जर्वर्स इस पर नजर बनाए हुए हैं कि क्या Election Commission ऑफ इंडिया भविष्य में अपनी कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजी में बदलाव लाएगा।
