Election Commission of India ने वोटर लिस्ट के स्पेशल रिवीज़न को लेकर चल रहे अंदरूनी मतभेदों की खबरों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब आयोग पर बड़े पैमाने पर वोटर्स के नाम हटाने और नियमों के उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं।
Election Commission of India (ECI) ने एक औपचारिक बयान जारी कर उन मीडिया रिपोर्ट्स को बेबुनियाद बताया है जिनमें आयोग के भीतर किसी भी तरह के विवाद का दावा किया गया था। आयोग ने साफ किया है कि स्पेशल इंटेन्सिव रिवीज़न (SIR) से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। यह खंडन तब आया है जब ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई थीं कि पिछले 10 महीने में चुनाव आयुक्तों ने वोटर डेटाबेस मैनेजमेंट को लेकर 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
विवाद की जड़ क्या है?
यह पूरा विवाद 'स्पेशल इंटेन्सिव रिवीज़न' एक्सरसाइज से शुरू हुआ है। इसका मकसद वोटर लिस्ट से डुप्लीकेट या अयोग्य नामों को हटाना था। हालांकि, गोवा और दिल्ली जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में वैध वोटर्स के नाम बिना पूर्व सूचना के हटाने का आरोप लगा है, जिससे राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों के बीच भारी नाराजगी है।
अदालती हस्तक्षेप और भविष्य की चुनौती
बॉम्बे हाई कोर्ट (गोवा बेंच) ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट को किसी का नाम हटाने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी नाम हटाने से पहले औपचारिक सुनवाई अनिवार्य है।
अब सबकी नजर 6 अक्टूबर, 2026 पर है, जब INDIA गठबंधन ने ECI मुख्यालय तक मार्च निकालने और राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है। संस्थागत स्थिरता पर उठते इन सवालों के बीच, बाजार और नागरिक समाज अब अदालती सुनवाइयों और आयोग की अगली प्रतिक्रिया पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं।
