एक नई रिपोर्ट के मुताबिक **2019 से 2025** के बीच EU-लिंक्ड जहाजों का **66%** हिस्सा दक्षिण एशिया में रिसाइकिल हुआ है। इस खबर के बाद से भारतीय शिप रिसाइकिलिंग इंडस्ट्री पर नजरें टिक गई हैं, खासकर Hong Kong Convention और EU की मंजूरी को लेकर।
NGO Shipbreaking Platform और Transport & Environment की हालिया रिपोर्ट ने ग्लोबल मैरीटाइम रिसाइकिलिंग सेक्टर में एक नई बहस छेड़ दी है। डेटा के अनुसार, 2019 से 2025 के बीच EU से जुड़े कुल जहाजों का 66% हिस्सा भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे दक्षिण एशियाई देशों में भेजा गया। इसके मुकाबले, यूरोप की अपनी सुविधाओं में केवल 5% जहाजों की ही रिसाइकिलिंग हो सकी।
'फ्लैग-हॉपिंग' और चुनौतियां
रिपोर्ट में 'फ्लैग-हॉपिंग' जैसी प्रथाओं पर भी चिंता जताई गई है, जहाँ जहाज के मालिक डिस्पोजल से ठीक पहले उसका रजिस्ट्रेशन बदल लेते हैं ताकि EU के कड़े पर्यावरणीय नियमों से बच सकें। डेटा बताता है कि इस दौरान 102 जहाजों ने ऐसा किया।
भारतीय यार्ड्स के लिए मायने
गुजरात का अलंग (Alang) शिप रिसाइकिलिंग हब इस रिपोर्ट के केंद्र में है। अब इंडस्ट्री का पूरा फोकस 26 जून, 2025 से लागू हुए Hong Kong Convention के मानकों को पूरा करने पर है। European Commission अभी भी भारतीय रिसाइकिलिंग यार्ड्स को अपनी 'अप्रूव्ड लिस्ट' में शामिल करने के लिए मूल्यांकन कर रहा है।
निवेशकों के लिए अहम क्या है?
यदि अधिक भारतीय यार्ड्स को EU की मंजूरी मिलती है, तो वे यूरोपीय मालिकों से सीधे कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करने में सक्षम होंगे। हालांकि, बीचनिंग (beaching) पद्धति और क्लोज्ड-कंटेनमेंट मानकों को लेकर NGO का दबाव बना हुआ है। अब बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कितने भारतीय यार्ड्स को ग्लोबल मानकों के अनुरूप EU की हरी झंडी मिलती है और इसका सेक्टर की प्रॉफिटेबिलिटी पर क्या असर पड़ता है।
