Election Commission of India (ECI) गंभीर संस्थागत विवादों के घेरे में है। हालिया रिविजन के दौरान **13 करोड़** मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने के बाद प्रशासनिक स्थिरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
Election Commission of India (ECI) इन दिनों 'Special Intensive Revision' (SIR) के बाद भारी जन आक्रोश और संस्थागत जांच का सामना कर रहा है। 2025 से शुरू हुई इस प्रक्रिया में 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 13 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। इस बड़े पैमाने पर हुई छंटनी ने दिल्ली और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों में विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है, जहां प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
आयोग के भीतर मतभेद
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आयोग के भीतर ही गहरा असंतोष है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में 14 बार औपचारिक रूप से अपनी असहमति दर्ज कराई है। इन आपत्तियों में मुख्य रूप से एकतरफा निर्णय लेने की प्रक्रिया और डेटाबेस मैनेजमेंट पर सवाल उठाए गए हैं, जिसे आलोचक संवैधानिक मर्यादा के खिलाफ बता रहे हैं।
डैमेज कंट्रोल की कोशिश
बढ़ते सार्वजनिक दबाव के बाद, ECI ने 29 सितंबर से 1 अक्टूबर 2026 के बीच एक विशेष अभियान चलाया, ताकि गलती से बाहर किए गए मतदाताओं को फिर से एनरोल किया जा सके।
निवेशकों के लिए क्यों जरूरी है?
आर्थिक दृष्टिकोण से, किसी भी देश की संस्थागत विश्वसनीयता निवेश के माहौल की नींव होती है। संस्थागत भरोसा और पारदर्शी गवर्नेंस बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। निवेशक संवैधानिक संस्थाओं के सुचारू संचालन को राजनीतिक स्थिरता का संकेत मानते हैं। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या चुनाव आयोग अपनी निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाकर जनता का भरोसा फिर से कायम कर पाएगा या नहीं।
