Delhi State Mental Health Authority के पास **₹9 करोड़** का भारी-भरकम बजट होने के बावजूद, यह संस्था अब तक पूरी तरह निष्क्रिय बनी हुई है। दिल्ली हाई कोर्ट के बार-बार निर्देश देने के बाद भी कोई मीटिंग नहीं हो सकी है, जिससे शहर की मेंटल हेल्थ व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लग गया है।
रेगुलेटरी वॉइड का संकट
Delhi State Mental Health Authority (SMHA) इस समय पूरी तरह से सुस्त पड़ी है, जिससे दिल्ली के हेल्थकेयर सेक्टर में एक बड़ा रेगुलेटरी गैप (Regulatory Gap) बन गया है। साल 2024 के अंत में नोटिफिकेशन के बाद इसे ₹9 करोड़ का आवंटन मिला था, लेकिन आज तक एक भी मीटिंग आयोजित नहीं हो पाई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी बार-बार इसे सक्रिय करने के आदेश दिए हैं ताकि 'Mental Healthcare Act, 2017' का पालन सुनिश्चित किया जा सके, लेकिन स्थिति जस की तस है।
क्यों जरूरी है यह अथॉरिटी?
SMHA का काम दिल्ली में मेंटल हेल्थ के लिए वॉचडॉग की भूमिका निभाना है। इसके बिना निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है:
- मेंटल हेल्थ सेंटर्स का रजिस्ट्रेशन नहीं हो पा रहा है।
- सुविधाओं और सर्विस क्वालिटी की ऑडिट नहीं हो रही है।
- मरीजों की शिकायतों के निपटारे के लिए कोई अधिकृत बॉडी नहीं है।
प्रशासनिक नाकामी के नतीजे
All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) के हालिया सर्वे में सामने आया है कि बजट प्लानिंग और एग्जीक्यूशन के बीच बहुत बड़ा अंतर है। बोर्ड में जरूरी मेंबर्स की नियुक्ति न होने के कारण ₹9 करोड़ का यह बजट कागजों पर ही सिमट कर रह गया है।
इतना ही नहीं, कानून के तहत 'Mental Health Review Boards' का गठन होना अनिवार्य था, जो मरीजों को कानूनी राहत दिलाने में मदद करते। फिलहाल, इन बोर्ड्स के अभाव में मरीजों और उनके परिवारों के पास शिकायतों के लिए कोई औपचारिक माध्यम नहीं है, जो एक गंभीर बुनियादी ढांचागत कमी है। फिलहाल सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि सरकार कब तक नॉन-ऑफिशियल मेंबर्स की नियुक्ति करती है और काम में तेजी लाती है।
