छत्तीसगढ़ में 'सोने' से ज्यादा कीमती खोज!
Deccan Gold Mines Limited (DGML) के निवेशकों के लिए आज का दिन बड़ी खुशखबरी लेकर आया। कंपनी ने ऐलान किया है कि छत्तीसगढ़ के भालूकोना (Bhalukona) स्थित निकेल-कॉपर-PGE प्रोजेक्ट में शुरुआती ड्रिलिंग के नतीजे काफी दमदार मिले हैं। इन खबरों के बाद, स्टॉक 12.5% से अधिक चढ़कर ₹136.30 के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले 52 हफ्तों का उच्चतम स्तर है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरुआती खोजों में निकेल, कॉपर और पैलेडियम जैसे बहुमूल्य खनिजों (minerals) से भरपूर एक 'इंट्रूसिव कॉम्प्लेक्स' (intrusive complex) का पता चला है। पहले ड्रिल होल में 0.4% निकेल इक्विवेलेंट (Ni_Eq) का मिनरलाइजेशन करीब 30 मीटर की गहराई तक मिला है। सबसे अच्छे सेक्शन में 1.01% निकेल, 0.29% कॉपर और 0.2 g/t पैलेडियम 2.6 मीटर की गहराई तक, 103.4 मीटर से पाया गया है। अभी तक 1,200 मीटर की कोर ड्रिलिंग सात अलग-अलग होल में 1.3 किलोमीटर लंबी संभावित स्ट्राइक ज़ोन पर पूरी की जा चुकी है। इस खबर के दम पर कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) ₹2,400-₹2,600 करोड़ के दायरे में पहुंच गया।
वित्तीय तस्वीर और मार्केट का मिजाज
जहां एक तरफ खोज की खबर से शेयर रॉकेट बन गए हैं, वहीं कंपनी की मौजूदा वित्तीय हालत बताती है कि अभी लंबा सफर तय करना है। DGML का प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो जहां -40.91x से -68.93x के बीच निगेटिव है, वहीं रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) -14.1% और रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (ROCE) -13.1% है। इसका मतलब है कि कंपनी अभी मुनाफे में नहीं है। इसकी तुलना में, NMDC जैसी स्थापित भारतीय माइनिंग कंपनियों का P/E रेश्यो करीब 10.5x है, और Hindalco Industries का P/E रेश्यो 14.5-15.3x के आसपास है।
यह खोज ऐसे समय में आई है जब भारत सरकार 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन' (National Critical Mineral Mission) जैसे पहलों से महत्वपूर्ण खनिजों (critical minerals) के एक्सप्लोरेशन और प्रोसेसिंग को बढ़ावा दे रही है। मई 2026 में निकेल की कीमतें करीब $18,500 प्रति टन थीं, जबकि कॉपर रिकॉर्ड स्तर के करीब था और पैलेडियम $1,407 प्रति औंस के भाव पर था।
शुरुआती खोज के रिस्क और कंपनी की योजना
DGML के शेयर में आई यह तेजी शुरुआती एक्सप्लोरेशन नतीजों पर आधारित है, जिसमें बड़े रिस्क भी शामिल हैं। यह सिर्फ पहला कदम है। एक माइनिंग रिसोर्स तय करने के लिए काफी अधिक ड्रिलिंग, जियोलॉजिकल मॉडलिंग और फिजिबिलिटी स्टडीज की जरूरत होगी। यह अभी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि यह मिनरलाइजेशन आर्थिक रूप से व्यवहारिक (economically viable) होगा या नहीं। नई माइन विकसित करने में भारी कैपिटल इन्वेस्टमेंट (capital investment) की जरूरत होगी और भविष्य में फंड जुटाने पर मौजूदा शेयरधारकों का हिस्सा कम (dilute) हो सकता है।
हालांकि सरकारी नीतियां मददगार हैं, माइनिंग लीज और पर्यावरण मंजूरी मिलने में लंबा और अनिश्चित समय लग सकता है। कंपनी के मैनेजमेंट का लक्ष्य है कि जल्द से जल्द ड्रिलिंग तेज कर माइनिंग लीज के लिए आवेदन किया जाए, ताकि भालूकोना भारत की पहली निकेल-कॉपर-PGE माइन बन सके। बाजार में अभी इस खोज को लेकर उत्साह है, लेकिन Bhalukona प्रोजेक्ट का असली मूल्य और संभावनाओं को साबित होने में सालों लगेंगे।