Tata Trusts: ट्रस्टी Darius Khambata ने छोड़ा पद, Tata Sons के IPO को लेकर खड़े किए बड़े सवाल

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AuthorAditya Rao|Published at:
Tata Trusts: ट्रस्टी Darius Khambata ने छोड़ा पद, Tata Sons के IPO को लेकर खड़े किए बड़े सवाल

टाटा ग्रुप के भीतर हलचल तेज हो गई है। सीनियर एडवोकेट Darius Khambata ने Tata Trusts के ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया है। उनके इस फैसले के पीछे कंपनी के गवर्नेंस और Tata Sons के संभावित IPO को लेकर गहरा मतभेद है।

टाटा समूह की नींव और उसकी कार्यप्रणाली में अब एक बड़ा टकराव देखने को मिल रहा है। सीनियर एडवोकेट Darius Khambata ने Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust के ट्रस्टी के रूप में दोबारा नियुक्ति न लेने का फैसला किया है। यह कदम टाटा ग्रुप में चल रहे गवर्नेंस विवादों का एक बड़ा संकेत है।

विवाद की जड़: Tata Sons का IPO

Darius Khambata लंबे समय से Tata Sons के IPO लाने के प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि कंपनी को पब्लिक लिस्ट करना टाटा ग्रुप की परोपकारी विरासत (Philanthropic Mission) के लिए खतरा हो सकता है। यह ग्रुप का होल्डिंग स्ट्रक्चर है, जहां ट्रस्ट्स के पास Tata Sons की लगभग 66% हिस्सेदारी है।

RBI का दबाव और रेगुलेटरी नियम

यह सारा विवाद सिर्फ कंपनी के अंदरूनी फैसले तक सीमित नहीं है। RBI ने Tata Sons को 'अपर लेयर' NBFC के रूप में वर्गीकृत किया है। इन सख्त नियमों के तहत, इतनी बड़ी फाइनेंशियल एंटिटी को पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य हो सकता है। यही कारण है कि रेगुलेटरी अनुपालन (Compliance) और ट्रस्ट की निजी प्रकृति के बीच खींचतान बढ़ गई है।

आगे क्या होगा?

यह तनाव 17 सितंबर, 2026 की बोर्ड मीटिंग के बाद चरम पर पहुंच गया था, जिसे Khambata ने आंतरिक विफलता का पल बताया है। अब बाजार की नजर 26 नवंबर, 2026 को होने वाली अगली बड़ी बोर्ड मीटिंग पर है। इस मीटिंग में Noel Tata यह स्पष्ट कर सकते हैं कि पुरानी मीटिंग में लिए गए फैसले मान्य रहेंगे या नहीं। फिलहाल, निवेशकों के लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनी कैसे अपनी विरासत और कानूनी मजबूरियों के बीच संतुलन बनाती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.