जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट ने सरकारी शिक्षा प्रणाली की बुरी हालत को लेकर तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट के मुताबिक, सरकारी स्कूलों की 'लगभग बर्बादी' ने ही प्राइवेट स्कूलों के जाल को फलने-फूलने का मौका दिया है। यह हाल सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश में अभिभावक इसी वजह से प्राइवेट स्कूलों का रुख करने को मजबूर हैं।
सरकारी शिक्षा की नाकामयाबी
कोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी और नागरिकों को बेहतर विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया। कोर्ट की नजर में, यह एक ऐसी 'सिस्टमैटिक फेलियर' है जिसने प्राइवेट स्कूलों को पनपने का मुख्य कारण दिया है। गरीब से गरीब परिवार भी बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं, इस उम्मीद में कि वहां से उन्हें बेहतर भविष्य मिलेगा। सरकार के तमाम दावों के बावजूद, सरकारी स्कूलों की हालत में कोई खास सुधार नजर नहीं आता।
प्राइवेट स्कूल: एक पेशा और उसका रेगुलेशन
वहीं, कोर्ट ने यह भी माना कि प्राइवेट स्कूल चलाना एक 'ऑक्यूपेशन' (occupation) है, जिसे संविधान के आर्टिकल 19(1)(g) के तहत सुरक्षा मिली है। इसमें बड़ा निवेश होता है और संस्थाएं 'रीज़नेबल प्रॉफिट' (reasonable profit) कमा सकती हैं। लेकिन, कोर्ट ने साफ चेताया कि यह 'अनुचित मुनाफाखोरी' (undue profiteering) का लाइसेंस नहीं है। सरकार को प्राइवेट स्कूलों में दखलअंदाजी कम कर, उन्हें मजबूत बनाने वाली नीतियां लानी चाहिए, बजाय इसके कि सिर्फ रेगुलेशन पर ध्यान दिया जाए।
फीस कमेटी (FFC) और उसका कामकाज
कोर्ट ने फीस तय करने वाली कमेटी (FFC) के कामकाज पर भी चिंता जताई। याचिकाकर्ताओं ने फीस तय करने में मनमानी और फिजिकल वेरिफिकेशन न होने के आरोप लगाए थे। कोर्ट ने कहा कि भले ही नियमों का मकसद कमर्शियलाइजेशन रोकना है, लेकिन FFC को फीस तय करने में और 'रेशनल अप्रोच' (rational approach) अपनानी चाहिए। बड़े शहरों के बड़े संस्थानों या विशेष शिकायतों वाले मामलों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सबसे अहम बात, कोर्ट ने उस प्रावधान को रद्द कर दिया जिसके तहत रिटायर्ड सरकारी अधिकारी FFC के चेयरमैन बन सकते थे। अब इन कमेटियों की अध्यक्षता रिटायर्ड हाई कोर्ट जज ही करेंगे, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के 'TMA Pai Foundation' जैसे मामलों में भी कहा गया है।
व्यापक असर
यह फैसला भारत में शिक्षा के क्षेत्र में पब्लिक पॉलिसी, प्राइवेट सेक्टर और नतीजों के बीच के जटिल रिश्ते को दर्शाता है। ज्यूडिशियरी ने प्राइवेट स्कूलों की आर्थिक भूमिका को स्वीकार किया है, साथ ही पारदर्शिता और शोषण रोकने की मांग की है। प्राइवेट संस्थानों के लिए यह एक चुनौती भरा रेगुलेटरी माहौल है, जिसमें उन्हें अभिभावकों की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। भारत का शिक्षा क्षेत्र, खासकर K-12 सेगमेंट, तेजी से बढ़ रहा है और आगे भी इसमें ऐसे न्यायिक फैसले और सरकारी नीतियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।