कॉर्पोरेट लॉ बिल 2026: बायबैक और मर्जर में बड़े बदलावों का प्रस्ताव

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AuthorNeha Patil|Published at:
कॉर्पोरेट लॉ बिल 2026: बायबैक और मर्जर में बड़े बदलावों का प्रस्ताव

भारत में कारोबार के नियमों को आसान बनाने के लिए प्रस्तावित कॉर्पोरेट लॉ (संशोधन) बिल 2026 में कई अहम बदलावों की बात कही गई है। इस बिल के तहत कंपनियों को साल में दो बार शेयर बायबैक (Share Buyback) करने की अनुमति मिल सकती है, साथ ही मर्जर (Merger) के लिए मंजूरी के नियमों को भी सरल किया जाएगा। इसके अलावा, हाइब्रिड एनुअल जनरल मीटिंग (Hybrid AGM) आयोजित करने का रास्ता भी साफ हो सकता है। फिलहाल यह बिल संसद की समीक्षा में है और इसका मकसद कंपनियों के कैपिटल मैनेजमेंट (Capital Management) और ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) को बेहतर बनाना है।

कैपिटल मैनेजमेंट और बायबैक में सहूलियत

बिल का एक बड़ा आकर्षण यह है कि योग्य कंपनियों को एक फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में दो शेयर बायबैक करने की इजाजत दी जा सकती है, बशर्ते उनके बीच कम से कम छह महीने का गैप हो। इससे लिस्टेड (Listed) और अनलिस्टेड (Unlisted) दोनों तरह की कंपनियों को अतिरिक्त कैश को मैनेज करने और शेयरधारकों को वैल्यू वापस देने का ज्यादा लचीला तरीका मिलेगा। हालांकि, यह बदलाव कुछ खास एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया (Eligibility Criteria) और लिस्टेड कंपनियों के लिए SEBI के दिशानिर्देशों के तहत ही होगा।

मर्जर की प्रक्रिया और डिजिटल मीटिंग्स

यह बिल खासकर छोटी कंपनियों और पूरी तरह से सब्सिडियरी (Wholly-owned Subsidiaries) के लिए मर्जर की प्रक्रिया को तेज करने का लक्ष्य रखता है। इसमें शेयरधारकों और लेनदारों (Creditors) से 90% की जगह 75% मंजूरी का प्रस्ताव है, जिससे इंटरनल रीस्ट्रक्चरिंग (Internal Restructuring) प्रोजेक्ट्स के पूरा होने में काफी तेजी आ सकती है। इसके अलावा, यह कानून डिजिटल और हाइब्रिड AGM को भी औपचारिक रूप देगा, जिससे कंपनियां वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग्स कर सकेंगी। हालांकि, हर तीन साल में कम से कम एक बार फिजिकल मीटिंग जरूरी रहेगी, लेकिन वर्चुअल विकल्पों से शेयरधारकों की भागीदारी और पहुंच बढ़ेगी।

CSR और ऑडिटर पर नियमों में बदलाव

कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) के नियमों में भी बदलाव की उम्मीद है। अनिवार्य CSR खर्च के लिए प्रॉफिट की सीमा ₹5 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने का प्रस्ताव है। इससे मध्यम आकार की ज्यादा कंपनियां सख्त CSR समितियों और खर्च की आवश्यकताओं से बाहर हो सकती हैं। साथ ही, बिल में ऑडिटर की स्वतंत्रता (Auditor Independence) को लेकर कड़े नियम लाए गए हैं। ऑडिट पीरियड खत्म होने के बाद क्लाइंट्स को नॉन-ऑडिट सर्विस (Non-Audit Services) देने पर तीन साल का बैन लगाया जाएगा। यह कदम कॉर्पोरेट गवर्नेंस (Corporate Governance) और जवाबदेही को मजबूत करने के लिए उठाया गया है।

रेगुलेटरी असर और छोटी कंपनियों की परिभाषा

बिल के तहत नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) के अधिकार क्षेत्र का विस्तार किया जाएगा और रेस्ट्रिक्टेड स्टॉक यूनिट्स (RSUs) जैसी मॉडर्न एम्प्लॉई रिवॉर्ड स्कीम्स (Employee Reward Schemes) को भी स्पष्ट रूप से मान्यता दी जाएगी। इसके अलावा, 'छोटी कंपनी' (Small Company) की परिभाषा को भी बदलने का प्रस्ताव है। पेड-अप कैपिटल (Paid-up Capital) की सीमा ₹20 करोड़ और सालाना टर्नओवर (Annual Turnover) की सीमा ₹200 करोड़ तक बढ़ाई जाएगी। इससे ज्यादा बिजनेस कम कंप्लायंस स्टैंडर्ड्स (Compliance Standards) का फायदा उठा सकेंगे।

निवेशकों और कॉर्पोरेट जगत के हितधारकों को इस बिल की प्रगति पर नजर रखनी चाहिए। अंतिम रूप से जो बिल पारित होगा और सरकार द्वारा नियमों की अधिसूचना जारी की जाएगी, उसी के आधार पर कंपनियों की बैलेंस शीट और गवर्नेंस प्रथाओं पर इसका असर तय होगा।

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