देश की बड़ी कंसल्टिंग फर्मों में एक दशक से काम कर रहे सीनियर प्रोफेशनल्स के इस्तीफे का सिलसिला तेज हो गया है। ये लोग हफ्ते में **70 घंटे** से ज्यादा काम करने और मामूली सैलरी ग्रोथ से परेशान हैं। यह दिखाता है कि अब हाई-स्किल्ड कर्मचारी लंबे समय तक कंपनी के प्रति वफादारी से ज्यादा वर्क-लाइफ बैलेंस और बेहतर सैलरी को अहमियत दे रहे हैं। निवेशकों को इस टैलेंट की कमी का कंपनियों की कार्यक्षमता और प्रोजेक्ट की लागत पर पड़ने वाले असर पर नजर रखनी होगी।
कंसल्टिंग इंडस्ट्री पर बर्नआउट का खतरा
भारत की जानी-मानी कंसल्टिंग फर्मों से अनुभवी प्रोफेशनल्स के नौकरी छोड़ने का सिलसिला इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। हाल ही में, डेल्लोइट (Deloitte) जैसी बड़ी ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म से एक 10 साल पुराने अनुभवी कर्मचारी के इस्तीफे ने इस मुद्दे को और हवा दी है। दरअसल, कंसल्टिंग बिजनेस का मॉडल ही ऐसा है कि सीनियर स्टाफ को क्लाइंट के जरूरी काम निपटाने, नए प्रोजेक्ट्स के प्रस्ताव तैयार करने और फर्म के अंदरूनी कामों को एक साथ संभालना पड़ता है। ऐसे में, कई प्रोफेशनल्स के लिए काम का बोझ इतना ज्यादा हो जाता है कि उनकी सैलरी ग्रोथ उस हिसाब से नहीं हो पाती, जिसकी वे उम्मीद करते हैं। इसी वजह से अनुभवी टैलेंट के कंपनी छोड़ने की दर बढ़ रही है।
इंडस्ट्री का दबाव और ऑपरेशनल रिस्क
आमतौर पर कंसल्टिंग फर्म एक पिरामिड स्ट्रक्चर पर काम करती हैं, जिसमें सीनियर कंसल्टेंट्स हाई-वैल्यू क्लाइंट प्रोजेक्ट्स के लिए जिम्मेदार होते हैं। जब फर्मों पर प्रॉफिट मार्जिन बनाए रखने का दबाव बढ़ता है, तो वे नए लोगों को हायर करने की बजाय मौजूदा स्टाफ पर ही काम का बोझ बढ़ा देती हैं। इससे काम के घंटे 70 घंटे प्रति सप्ताह से भी ज्यादा हो जाते हैं, क्योंकि कर्मचारियों को बिजनेस डेवलपमेंट के साथ-साथ कई प्रोजेक्ट्स को मैनेज करना पड़ता है। निवेशकों के लिए यह एक गंभीर ऑपरेशनल फैक्टर है। अनुभवी स्टाफ के कंपनी छोड़ने से रिक्रूटमेंट कॉस्ट बढ़ती है, जरूरी जानकारी का नुकसान होता है और प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है, जिसका सीधा असर फर्म के प्रॉफिट पर पड़ सकता है।
सैलरी और करियर की उम्मीदें
इंडस्ट्री में टेंशन का एक और कारण परफॉर्मेंस से जुड़े रिवॉर्ड और सैलरी हाइक के बीच का अंतर है। ऐसे कॉम्पिटिटिव सेक्टर में, प्रोफेशनल्स को उम्मीद होती है कि उनकी सैलरी उनके टेक्निकल योगदान के साथ-साथ उस हाई-प्रेशर वाले माहौल को भी दर्शाए जिसमें वे काम करते हैं। जब सैलरी में बढ़ोतरी मामूली लगती है, खासकर इतने इंटेंस एफर्ट के मुकाबले, तो टॉप टैलेंट दूसरे सेक्टरों या ऐसी कंपनियों में मौके तलाशते हैं, जहां शेड्यूल ज्यादा प्रेडिक्टेबल हो और वर्क-लाइफ बैलेंस बेहतर हो। यह ट्रेंड तब और आम हो रहा है जब टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट कंसल्टिंग स्पेस के प्रोफेशनल्स अपने समय पर ज्यादा कंट्रोल चाहते हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
कंसल्टिंग और प्रोफेशनल सर्विसेज सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि ये फर्म्स अपने ह्यूमन कैपिटल को कैसे मैनेज कर रही हैं। मुख्य रूप से इन बातों पर नजर रखनी होगी: एम्प्लॉई रिटेंशन रेट, टैलेंट एक्वीजीशन की लागत, और क्या कंपनियां प्रॉफिटेबिलिटी से समझौता किए बिना सस्टेनेबल प्रोजेक्ट डिलीवरी मॉडल अपना पा रही हैं। कंसल्टिंग फर्म्स कॉरपोरेट दुनिया का अहम हिस्सा बनी रहेंगी, लेकिन सीनियर टैलेंट को बनाए रखना और सैलरी की बढ़ती उम्मीदों को मैनेज करना उनकी लॉन्ग-टर्म ग्रोथ और स्टेबिलिटी के लिए निर्णायक साबित होगा। निवेशकों को आने वाली तिमाही अपडेट्स या एनुअल रिपोर्ट्स में मैनेजमेंट की टैलेंट मैनेजमेंट स्ट्रेटेजी पर कमेंट्री की तलाश करनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि क्या ये ह्यूमन रिसोर्स से जुड़ी चुनौतियां प्रोजेक्ट टाइमलाइन या ऑपरेशनल एफिशिएंसी को प्रभावित कर रही हैं।
