CPSE ETF ने पिछले 3 सालों में **25.6%** का सालाना कंपाउंडेड रिटर्न (CAGR) दिया है, जो कई दूसरे इंडेक्स फंड्स से काफी ज़्यादा है। करीब **₹19,491 करोड़** की असेट बेस वाले इस फंड में बड़ी सरकारी कंपनियां शामिल हैं। हालांकि, एनर्जी, पावर और डिफेंस जैसे सेक्टर्स पर ज़्यादा फोकस होने के कारण इसमें सरकारी नीतियों और सेक्टर की चाल से जुड़े खास जोखिम भी हैं, जिन पर निवेशकों को ध्यान देना चाहिए।
CPSE ETF का शानदार प्रदर्शन
पिछले 3 सालों में CPSE ETF ने बाकी इंडेक्स ETFs को पीछे छोड़ दिया है। इस फंड ने 25.6% का सालाना कंपाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) दर्ज किया है। Nippon India Mutual Fund द्वारा मैनेज किए जा रहे इस स्कीम का असेट बेस भी काफी बड़ा है, जिसके तहत मैनेजमेंट के तहत आने वाली असेट्स (AUM) लगभग ₹19,491 करोड़ तक पहुंच गई है (मध्य 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार)। यह शानदार प्रदर्शन पिछले कुछ सालों में सरकारी कंपनियों (PSU) के शेयरों में आई तेज़ी को दिखाता है।
सेक्टर्स पर फ़ोकस
यह ETF, Nifty CPSE टोटल रिटर्न इंडेक्स को ट्रैक करता है, जिसमें कुछ खास सेक्टर्स का दबदबा है। जहां दूसरे ब्रॉड मार्केट इंडेक्स फंड्स कई इंडस्ट्रीज में निवेश करते हैं, वहीं यह ETF मुख्य रूप से एनर्जी, ऑयल और गैस, पावर जेनरेशन और डिफेंस सेक्टर्स की सरकारी कंपनियों पर केंद्रित है। NTPC, Power Grid और Bharat Electronics जैसी कंपनियां इसके पोर्टफोलियो में प्रमुख होल्डिंग्स हैं। हाल की मज़बूत रिटर्न्स का बड़ा कारण इन खास सेक्टर्स का अनुकूल कारोबारी माहौल रहा है, न कि सिर्फ बाज़ार में आई रिकवरी।
जोखिमों को समझना ज़रूरी
इस ETF में निवेश करने वाले निवेशकों को यह समझना चाहिए कि इसका स्ट्रक्चर Nifty 50 जैसे पॉपुलर इंडेक्स फंड्स से काफी अलग है। केवल कुछ सेक्टर्स में कंसन्ट्रेशन होने के कारण, यह ETF सरकारी नीतियों और PSU कंपनियों से जुड़े रेगुलेटरी फैसलों के प्रति बहुत संवेदनशील है। अगर सरकारी विनिवेश योजनाएं, एनर्जी की प्राइसिंग पॉलिसीज़ या डिफेंस खर्चों का पैटर्न बदलता है, तो ETF में शामिल कंपनियों के प्रदर्शन पर सीधा असर पड़ सकता है।
इसके अलावा, यह फंड सेक्टर-स्पेसिफिक वोलेटिलिटी (उतार-चढ़ाव) के अधीन है। भले ही PSU स्टॉक्स में हालिया मज़बूती के दौरान इसने अच्छा प्रदर्शन किया हो, लेकिन डाइवर्सिफिकेशन की कमी का मतलब है कि अगर एनर्जी या पावर सेक्टर्स में गिरावट आती है, तो यह ETF ज़्यादा डाइवर्सिफाइड फंड की तुलना में तेज़ गिरावट दिखा सकता है। निवेशकों को ट्रैकिंग एरर रिस्क का भी सामना करना पड़ सकता है, जहां फंड के रिटर्न ऑपरेशनल कारणों से अंडरलाइंग इंडेक्स से थोड़े अलग हो सकते हैं।
निवेशकों के लिए क्या है ज़रूरी?
इस फंड का विश्लेषण करने वाले निवेशकों के लिए, सबसे अहम चीज़ें सरकारी नीतियों से जुड़े अपडेट्स और इंडेक्स बनाने वाली सरकारी कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर नज़र रखना है। भले ही पिछला रिटर्न मज़बूत रहा हो, यह एनर्जी और डिफेंस सेक्टर्स के खास साइक्लिकल प्रदर्शन से जुड़ा है। निवेशकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह प्रोडक्ट उनके रिस्क टॉलरेंस के हिसाब से सही है, क्योंकि यह ब्रॉड मार्केट इन्वेस्टमेंट के बजाय सरकारी कंपनियों पर एक सेक्टर-स्पेसिफिक बेट की तरह काम करता है। अगले महत्वपूर्ण अपडेट्स संभवतः इस बात से जुड़े होंगे कि ये कोर सेक्टर्स भविष्य की मांग को कैसे पूरा करते हैं और बदलते आर्थिक हालात में अपनी वर्तमान लाभप्रदता बनाए रख पाते हैं या नहीं।
