COP17 की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि दुनिया की **42%** भूमि का प्रबंधन स्वदेशी समुदाय कर रहे हैं। नागालैंड और सुंदरबन के भारतीय मॉडल वैश्विक स्तर पर सराहे जा रहे हैं, लेकिन निवेशकों के लिए नेशनल क्लाइमेट गोल्स और फंडिंग के बीच का अंतर एक बड़ा जोखिम बना हुआ है।
येरेवान में आयोजित COP17 बायोडायवर्सिटी समिट में स्वदेशी समुदायों (IPLC) की भूमिका पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट बताती है कि ये समुदाय दुनिया की कुल जमीन के लगभग 42% हिस्से की देखरेख कर रहे हैं, जिसमें जैव विविधता वाले 1/3 संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं। अब कंजर्वेशन की रणनीति सेंट्रलाइज्ड फैसलों से हटकर कम्युनिटी-लेड मॉडल्स की ओर शिफ्ट हो रही है।
भारत की सफलता की कहानी
इस वैश्विक चर्चा में भारत के दो उदाहरण प्रमुखता से उभरे हैं:
- नागालैंड: यहाँ कम्युनिटी-लेड फॉरेस्ट कंजर्वेशन जोन ने औद्योगिक गतिविधियों पर रोक लगाकर इकोसिस्टम को फिर से जीवित किया है।
- नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व: यहाँ स्थानीय समुदायों ने विदेशी प्रजातियों को हटाकर स्थानीय वनस्पतियों को बहाल करने का एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसे दूसरी जगहों पर भी लागू किया जा सकता है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
फूड सिक्योरिटी और क्लाइमेट रेजिलिएंस के नजरिए से सुंदरबन डेल्टा का उदाहरण बहुत अहम है। वहां के निवासियों ने खारे पानी में भी बेहतर प्रदर्शन करने वाली पारंपरिक चावल की किस्मों को दोबारा जीवित किया है। फूड और एग्रीकल्चर सेक्टर की कंपनियों पर अब यह दबाव बढ़ सकता है कि वे सप्लाई चेन में ऐसी क्लाइमेट-रेजिलिएंट प्रैक्टिस को शामिल करें, ताकि भविष्य के यील्ड रिस्क (Yield Risk) को कम किया जा सके।
पॉलिसी और फाइनेंस का 'गैप' है रिस्क
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू फंडिंग का अभाव है। हालांकि 97% देश एग्रो-इकोलॉजी का समर्थन करने का दावा करते हैं, लेकिन केवल 51% देशों ने इसके लिए फंड या क्लियर प्रोग्रेस इंडिकेटर तय किए हैं। Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework (KMGBF) के बावजूद, फंडिंग की कमी से इन योजनाओं को स्केल करना मुश्किल हो सकता है। ESG अनुपालन और क्लाइमेट रिस्क को ट्रैक करने वाले निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि सरकारें इन संरचनात्मक बाधाओं को कैसे दूर करती हैं।
