देश की सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए Central Industrial Security Force (CISF) एक बड़ा बदलाव करने जा रही है। 1 नवंबर से सुरक्षा का मॉडल रीजनल के बजाय सेक्टर-आधारित (Sector-based) होगा, जिसका सीधा असर बड़ी सरकारी कंपनियों पर पड़ेगा।
सुरक्षा में 'स्पेशलाइजेशन' पर जोर
1 नवंबर से CISF अपने काम करने के पुराने ढर्रे यानी 'टेरिटोरियल' मॉडल को अलविदा कहेगी। अब सुरक्षा की जिम्मेदारी इंडस्ट्री-स्पेसिफिक कमांड्स के हाथों में होगी। इससे पहले एक ही ऑफिसर माइनिंग, स्टील और पावर जैसे अलग-अलग क्षेत्रों की सुरक्षा देखता था, जिससे कभी-कभी काम में तालमेल की कमी होती थी। अब हर सेक्टर के लिए अलग एक्सपर्ट टीम होगी, जो उस इंडस्ट्री की जरूरतों को बारीकी से समझेगी।
सरकारी कंपनियों (PSUs) पर होगा असर
यह बदलाव Coal India, Steel Authority of India (SAIL) और NTPC जैसी बड़ी सरकारी कंपनियों के लिए काफी अहम है। इन कंपनियों के बड़े इंस्टॉलेशंस की सुरक्षा अब सीधे उन कमांड्स के पास होगी जो उस इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली से परिचित हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे सिक्योरिटी प्रोटोकॉल और कंपनी के ऑपरेशनल काम के बीच बेहतर तालमेल बैठेगा और साइट पर आने वाली अड़चनें कम होंगी।
एटॉमिक एनर्जी मॉडल से मिली सीख
इस नए बदलाव की प्रेरणा 2018 में एटॉमिक एनर्जी सेक्टर में लागू किए गए सफल मॉडल से ली गई है। वहां इस वर्टिकल अप्रोच ने प्रोडक्शन से लेकर कचरा प्रबंधन (waste management) तक पूरी चेन को सुरक्षित किया था। अब उसी तर्ज पर अन्य इंडस्ट्रीज को भी ढालने की तैयारी है।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
हालांकि, जमीन पर मौजूद जवानों की संख्या में कोई बदलाव नहीं होगा, लेकिन सुपरवाइजरी लेवल पर यह रिफॉर्म रिस्क असेसमेंट को बेहतर बनाएगा। निवेशकों को अब यह ट्रैक करना होगा कि क्या इस स्पेशलाइज्ड सुपरविजन से कंपनियों की ऑपरेशनल एफिशिएंसी में सुधार आता है और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां कम होती हैं।
