महाराष्ट्र में सरकारी हॉस्टलों के ऑडिट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, चार साल में छह ऐसे हॉस्टल को ₹1.62 करोड़ की सरकारी राशि मिली, जो असल में चल ही नहीं रहे थे। इस रिपोर्ट ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था और फंड के आवंटन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कैसे हुआ ₹1.62 करोड़ का गबन?
CAG की रिपोर्ट, जो 10 जुलाई को राज्य विधानसभा में पेश की गई, में सामने आया है कि समाज न्याय और विशेष सहायता विभाग (Department of Social Justice and Special Assistance) ने ऐसे हॉस्टलों को भी फंड देना जारी रखा, जहां एक भी छात्र नहीं रहता था। ऑडिट में उदाहरण के तौर पर जालना के मोदीखान हॉस्टल का जिक्र है, जिसे ₹18 लाख का मानदेय दिया गया, जबकि वह ताला बंद और खाली पड़ा था। इसी तरह बुलढाणा और लातूर जैसे जिलों में भी ऐसे मामले सामने आए हैं। रिपोर्ट बताती है कि ठीक से जांच-पड़ताल न होने के कारण सरकारी पैसा छात्रों की भलाई के बजाय खाली इमारतों में जा रहा था।
इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाओं का अभाव
सिर्फ खाली हॉस्टलों का मामला ही नहीं है, बल्कि ऑडिट में 39 हॉस्टलों का निरीक्षण किया गया, जिनमें सुविधाओं की भारी कमी पाई गई। कई हॉस्टलों में डाइनिंग एरिया, लाइब्रेरी और CCTV कैमरे जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं थीं। छात्रों ने खाने की गुणवत्ता और पानी की सप्लाई को लेकर भी शिकायतें की हैं।
प्रशासनिक स्तर पर भी बड़ी खामियां सामने आई हैं। 280 सरकारी हॉस्टलों में से केवल 46 में ही बायोमेट्रिक उपस्थिति सिस्टम काम कर रहा था। कई जगहों पर खाद्य अनाज का बफर स्टॉक भी गायब मिला। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 49 हॉस्टलों में अधीक्षक नहीं थे, और पांच मामलों में महिला हॉस्टलों का प्रबंधन पुरुष अधीक्षकों द्वारा किया जा रहा था, जो नियमों के खिलाफ है।
छात्रों की पहुंच और राज्य के लक्ष्य पर असर
राज्य सरकार ने पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए हर तालुका में एक हॉस्टल बनाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन CAG की रिपोर्ट के अनुसार, यह लक्ष्य अभी अधूरा है। फाइनेंशियल ईयर 2023-24 के अंत तक, इन हॉस्टलों के लिए आवंटित ₹487 करोड़ में से ₹56.65 करोड़ राशि खर्च ही नहीं हुई। इस वजह से करीब 8,930 छात्रों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिल पा रही है। साथ ही, राज्य 2020 तक 500 हॉस्टल बनाने के लक्ष्य में से केवल 443 ही बना पाया है।
अब देखना यह होगा कि क्या राज्य सरकार बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन को सख्त करती है, स्टाफ की कमी को पूरा करती है, और हॉस्टल निर्माण में हो रही देरी को खत्म करती है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सरकारी पैसा सही छात्रों तक पहुंचे।
