Big Four (Deloitte, EY, KPMG, PwC) के पूर्व पार्टनर्स अब अपनी नई 'बुटीक' कंसल्टिंग फर्म शुरू कर रहे हैं। ये छोटी और फुर्तीली कंपनियां अपनी स्पेशलाइज्ड सर्विसेज और AI-ड्रिवन अप्रोच के जरिए बड़े मार्केट शेयर पर कब्जा जमा रही हैं, क्योंकि भारतीय कंसल्टिंग मार्केट **2031** तक **$17 बिलियन** के स्तर तक पहुंचने की उम्मीद है।
भारतीय एडवाइजरी सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। 'Big Four' यानी Deloitte, EY, KPMG और PwC के अनुभवी दिग्गज अब अपनी बुटीक कंसल्टिंग फर्म्स (जैसे Uniqus Consultech और Transaction Square) लॉन्च कर रहे हैं। हालांकि ग्लोबल दिग्गज अभी भी भारत के कुल कंसल्टिंग खर्च का 55% से 60% हिस्सा नियंत्रित करते हैं, लेकिन नई कंपनियों की एंट्री से मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
स्पेशलाइज्ड मॉडल की बढ़ती मांग
पारंपरिक दिग्गज कंपनियां लंबे समय से बड़े कॉरपोरेट्स के लिए 'पिरामिड मॉडल' का इस्तेमाल करती आई हैं, लेकिन अब ग्राहकों को ज्यादा तेज और सटीक समाधान चाहिए। बुटीक फर्म्स भारी-भरकम नौकरशाही को खत्म कर सीधे पार्टनर-लेड सर्विस दे रही हैं। ये कंपनियां IPO-रीडिनेस, M&A रीस्ट्रक्चरिंग, फैमिली ऑफिस मैनेजमेंट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे आला (niche) सेगमेंट्स पर फोकस कर रही हैं।
टैलेंट वॉर और मार्केट ग्रोथ
भारत का मैनेजमेंट कंसल्टिंग मार्केट 2026 में $9.36 बिलियन का रहा और 2031 तक इसके $17.01 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। इस ग्रोथ के पीछे डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और रिस्क मैनेजमेंट की मांग मुख्य वजह है। जैसे-जैसे सीनियर पार्टनर्स इन नई फर्म्स में जा रहे हैं, 'Big Four' के लिए अपने क्लाइंट्स और टैलेंट को बचाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है।
रिस्क और भविष्य की चुनौतियां
बुटीक फर्म्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'स्केलेबिलिटी' की है। जहां बड़े दिग्गजों के पास ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर है, वहीं छोटी कंपनियों के लिए बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स संभालना कठिन हो सकता है। साथ ही, मार्केट में बढ़ती भीड़ के कारण प्राइस वॉर छिड़ने का खतरा भी है, जिससे मार्जिन कम हो सकता है। अब देखना यह होगा कि ये बुटीक फर्म्स अपनी फुर्ती (agility) बनाए रख पाती हैं या धीरे-धीरे उसी नौकरशाही जाल में फंस जाती हैं जिसे खत्म करने का उन्होंने वादा किया था।
