बिहार के सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता है। **₹20,000 करोड़** की 'सेवा संकल्प और कायाकल्प' योजना के बावजूद, हजारों बच्चे आज भी जान जोखिम में डालकर जर्जर क्लासरूम में पढ़ने को मजबूर हैं।
बदहाल बुनियादी ढांचा
बिहार के सरकारी स्कूलों में स्थिति गंभीर बनी हुई है, जहां हजारों छात्र ऐसी इमारतों में शिक्षा लेने को मजबूर हैं जो कभी भी ढह सकती हैं। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, कई स्कूलों की छतें जर्जर हैं, पिलर में दरारें आ चुकी हैं और सरिया बाहर निकल आया है। इस जानलेवा स्थिति के कारण कई स्कूलों को अपनी कक्षाएं खुले बरामदों या अस्थाई टिन शेड में चलाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
नीति और क्रियान्वयन का अंतर
बिहार सरकार ने 'सेवा संकल्प और कायाकल्प' पहल के तहत ₹20,000 करोड़ का बड़ा बजट आवंटित किया है। इसका मकसद दो साल के भीतर गांव के स्कूलों के बुनियादी ढांचे का कायाकल्प करना है। 'बिहार स्टेट एजुकेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड' (BSEIDC) इस पूरे प्रोजेक्ट की नोडल एजेंसी है। हालांकि, सरकार ने छोटे मरम्मत कार्यों के लिए 30 नवंबर और नए निर्माण के लिए 31 मार्च की डेडलाइन तय की है, लेकिन जमीनी स्तर पर काम की रफ्तार बेहद धीमी है।
दरभंगा, मुजफ्फरपुर और छपरा जैसे जिलों में प्रधानाध्यापकों का कहना है कि उन्होंने 2017 से ही इमारतों की खतरनाक स्थिति की रिपोर्ट दी थी, जिस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
सामाजिक और आर्थिक असर
हालांकि इस मुद्दे का शेयर बाजार पर सीधा असर नहीं दिखता, लेकिन यह राज्य के आर्थिक विकास और गवर्नेंस की दक्षता का एक बड़ा संकेतक है। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा है कि देरी करने वाले अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी, लेकिन शिक्षकों का कहना है कि समस्या रिपोर्टिंग की नहीं, बल्कि उस पर होने वाली सुस्त कार्रवाई की है। खगड़िया में हुई एक दुखद घटना के बाद से अब राज्य के फंड के उपयोग और निर्माण कार्यों की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
आगे क्या देखना होगा?
आने वाले 31 मार्च की डेडलाइन तक प्रोजेक्ट्स की पूरी होने की दर ही असली टेस्ट होगी। स्टेकहोल्डर्स अब यह देख रहे हैं कि BSEIDC इस भारी-भरकम बजट का उपयोग वाकई ढांचागत बदलाव के लिए कर रही है या सिर्फ कॉस्मेटिक काम हो रहे हैं।
