बिहार का स्वास्थ्य विभाग एक बड़े विवाद में घिर गया है। आरोप है कि विभाग ने ₹1,500 के डस्टबिन ₹15,450 में खरीदे हैं। इस मामले में पारदर्शिता की मांग उठ रही है और सत्ताधारी दल ने CAG से ऑडिट कराने का सुझाव दिया है।
क्या है पूरा मामला?
बिहार स्वास्थ्य विभाग पर सरकारी पैसों की बंदरबांट के आरोप लगे हैं। खबर है कि विभाग ने डस्टबिन खरीदने के नाम पर ₹15,450 प्रति यूनिट का भुगतान किया है, जबकि बाजार में ऐसे डस्टबिन की कीमत मात्र ₹1,200 से ₹1,500 के बीच है। यह खरीद कथित तौर पर पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के कार्यकाल में राज्य की दवा खरीद के बजट से की गई थी।
विपक्ष का हल्ला बोल
विपक्ष की नेता रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाकर सरकार को घेर लिया है। उन्होंने उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और पूर्व मंत्री मंगल पांडेय से इस महंगे सौदे के पीछे की वजह पूछी है। विपक्ष का कहना है कि यह सरकारी धन के दुरुपयोग का एक गंभीर मामला है और प्रशासनिक सुधारों पर सवाल खड़े करता है।
सत्ता पक्ष का जवाब
इन आरोपों पर जवाब देते हुए, सत्ताधारी जनता दल (यूनाइटेड) के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा है कि इस मामले की जांच होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया है कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) को खरीद की रसीदों और बिलों की जांच करनी चाहिए ताकि किसी भी अनियमितता का पता चल सके। उन्होंने यह भी बताया कि बिहार विधानसभा की लोक लेखा समिति, जिसका नेतृत्व फिलहाल एक विपक्षी विधायक कर रहे हैं, भी इस मामले की जांच करने का अधिकार रखती है।
प्रशासनिक और राजनीतिक पहलू
यह पूरा मामला राज्य सरकार की खरीद प्रक्रिया और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़ा एक प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दा है। इसमें किसी भी सूचीबद्ध कंपनी या शेयर बाजार से जुड़ी इकाई का सीधा संबंध नहीं है। सार्वजनिक वित्त पर नजर रखने वालों के लिए, यह घटना सरकारी खरीद में उचित टेंडर प्रक्रिया और वित्तीय अनुशासन के महत्व को रेखांकित करती है। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या CAG द्वारा औपचारिक ऑडिट का आदेश दिया जाता है और खरीद दस्तावेजों के संबंध में क्या निष्कर्ष निकलते हैं।
