बेंगलुरु की स्टार्टअप Astrobase Space Technologies एक ऐसा रीयूजेबल रॉकेट बना रही है जो मीथेन-आधारित EVEREST इंजन से चलेगा। कंपनी को **$1.35 करोड़** की फंडिंग मिली है और इसका लक्ष्य भारत की लॉन्चिंग क्षमता को मजबूती देना है।
स्पेस सेक्टर में नई उम्मीद
बेंगलुरु स्थित स्पेस स्टार्टअप Astrobase Space Technologies ने साल 2028 के अंत तक अपने पहले ऑर्बिटल लॉन्च का ऐलान किया है। कंपनी एक 'मीडियम-लिफ्ट' रॉकेट पर काम कर रही है, जिसमें उनका अपना बनाया EVEREST इंजन इस्तेमाल होगा। यह इंजन 'फुल-फ्लो स्टेज्ड कम्बशन' तकनीक का उपयोग करता है, जो दुनिया के चुनिंदा स्पेस दिग्गजों के पास ही मौजूद है। फिलहाल कंपनी इंजन इंटीग्रेशन से निकलकर सब-सिस्टम टेस्टिंग के दौर में है।
लॉन्चिंग गैप को भरने की तैयारी
भारत की स्पेस इंडस्ट्री के लिए यह स्टार्टअप एक बड़े गेम-चेंजर के तौर पर देखा जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, भारत ने साल 2025 में करीब 9.5 टन पेलोड लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में भेजा था। अमेरिका और चीन जैसे देशों के मुकाबले यह आंकड़ा बहुत छोटा है। Astrobase का लक्ष्य सालाना 50 इंजन तैयार करना और भारत की लॉन्चिंग क्षमता को तेजी से बढ़ाना है।
तकनीकी चुनौतियां और रिस्क
कंपनी को IN-SPACe टेक्नोलॉजी अडॉप्शन फंड से मदद मिली है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं। सबसे बड़ी मुश्किल है 'फुल रीयूजेबिलिटी'। Astrobase का अनुमान है कि एक सफल लैंडिंग और बूस्टर रिकवरी के लिए उन्हें 5 से 10 टेस्ट फ्लाइट्स की जरूरत पड़ सकती है। रीयूजेबल रॉकेट बनाना बेहद महंगा और रिस्की काम है, जिसमें अक्सर देरी और बजट बढ़ने की संभावना बनी रहती है।
जोखिमों को कम करने के लिए स्टार्टअप बड़े पैमाने पर 3D प्रिंटिंग का इस्तेमाल कर रही है, ताकि डिजाइन की कमियों को जल्दी पकड़ा जा सके।
निवेशकों के लिए आगे क्या है?
मार्केट एनालिस्ट अब कंपनी के 'हॉट-फायर टेस्ट' (Hot-fire tests) पर नजर गड़ाए हुए हैं। ये टेस्ट तय करेंगे कि क्या EVEREST इंजन दबाव की स्थिति में टिक पाएगा। भविष्य में निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी होगा कि क्या कंपनी उत्पादन क्षमता को स्केल कर पाती है और ग्लोबल मार्केट में लॉन्च कॉस्ट के मामले में कितनी प्रतिस्पर्धी साबित होती है।
