Asia Pacific PE Deals: वैल्यू गिरी **14%**, पर 'ऑपरेशंस' पर फोकस बढ़ा!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Asia Pacific PE Deals: वैल्यू गिरी **14%**, पर 'ऑपरेशंस' पर फोकस बढ़ा!
Overview

एशिया पैसिफिक में प्राइवेट इक्विटी (PE) डील्स की संख्या **2025** में **5.4%** बढ़कर प्री-पैंडेमिक स्तरों को पार कर गई। लेकिन, इसी दौरान डील्स का कुल वैल्यू **14%** गिर गया, जो वैल्यूएशन पर दबाव और कम मेगा-डील्स का संकेत देता है। अब कंपनियाँ ज़्यादातर 'ऑपरेशंस' पर ध्यान दे रही हैं।

यह बदलाव एशिया पैसिफिक के प्राइवेट इक्विटी (PE) मार्केट के परिपक्व (maturing) होने का संकेत देता है। ग्लोबल मार्केट की अनिश्चितताओं को देखते हुए, निवेशक अब सिर्फ कैपिटल डिप्लॉय करने से आगे बढ़कर गहराई से ऑपरेशनल जानकारी के ज़रिए वैल्यू क्रिएट करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

डील वैल्यू में गिरावट की वजह

2025 में एशिया पैसिफिक प्राइवेट इक्विटी (PE) मार्केट में डील की संख्या बढ़ने के बावजूद कुल वैल्यू में गिरावट एक तरह का मार्केट एडजस्टमेंट दिखाती है। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, इस क्षेत्र में कुल डील वैल्यू 2024 की तुलना में लगभग 8% और 14% तक गिरी है, जो 2022 के स्तर पर वापस आ गई है। इस गिरावट की मुख्य वजह वैल्यूएशन की चुनौतियाँ और बड़ी, मेगा-ट्रांजैक्शन्स (mega-transactions) में भारी कमी है।

'ऑपरेशंस' पर बढ़ा फोकस, भारत में तेज़ ट्रेंड

इस माहौल में, लीडिंग PE फर्म्स अब इन-हाउस ऑपरेशनल टीम्स बना रही हैं, और भारत में लगभग आधे बड़े फंड्स के पास ऐसी टीमें हैं। ये टीमें पोर्टफोलियो कंपनियों के परफॉरमेंस को बेहतर बनाने पर काम कर रही हैं, जैसे रेवेन्यू बढ़ाना, कॉस्ट कम करना, डिजिटल अपग्रेड और बिजनेस मॉडल को री-डिज़ाइन करना। ऐसे समय में जब डील मल्टीपल्स (deal multiples) कम हुए हैं और लोन मिलना मुश्किल है, ऑपरेशनल इंवॉल्वमेंट ही बेहतर रिटर्न पाने की कुंजी बन गई है।

क्षेत्रीय बाज़ारों का मिला-जुला प्रदर्शन

दुनिया भर में 2025 में प्राइवेट इक्विटी निवेश $2.1 ट्रिलियन तक पहुँचा, लेकिन एशिया पैसिफिक का प्रदर्शन मिला-जुला रहा। जापान में कॉर्पोरेट गवर्नेंस रिफॉर्म्स के कारण वैल्यू और काउंट दोनों में ग्रोथ दिखी। वहीं, साउथईस्ट एशिया में डील वैल्यू 43% गिरी, और चीन को ट्रेड व रेगुलेटरी इश्यूज से जूझना पड़ा।

भारत का PE मार्केट और ऑपरेशनल वैल्यू क्रिएशन

भारत का PE और वेंचर कैपिटल (VC) मार्केट 2025 में मिले-जुले संकेत दे रहा था। 2024 में रिकॉर्ड फंडरेज़िंग और ग्रोथ के बाद, कुछ रिपोर्ट्स 2025 में धीमी गति की ओर इशारा कर रही थीं, जो 2019 के बाद सबसे धीमा साल हो सकता है। इसका कारण ग्लोबल अनिश्चितता, अमेरिकी टैरिफ पॉलिसी और भू-राजनीतिक तनाव हैं। हालांकि, भारत में ग्लोबल PE फर्म्स 'बिजनेस बिल्डर्स' की तरह काम कर रही हैं, लोकल टीमें बनाकर और मेजॉरिटी स्टेक लेकर ऑपरेशनल सुधार कर रही हैं। यह भारत की स्टेबल इकोनॉमी और बढ़ते डोमेस्टिक मार्केट का फायदा उठा रहा है।

नया फोकस और उसके रिस्क

ऑपरेशनल एग्जीक्यूशन पर ज़्यादा फोकस करने से नए रिस्क भी सामने आए हैं। फाइनेंशियल इंजीनियरिंग से हटकर ऑपरेशनल इम्प्रूवमेंट लागू करना काफी कॉम्प्लेक्स और मुश्किल काम है। इन टीमों की सफलता उनकी क्षमता पर निर्भर करती है कि वे बिज़नेस ऑपरेशंस को कितनी अच्छी तरह मैनेज कर पाते हैं और निवेश की अवधि में स्पष्ट परिणाम दे पाते हैं। असफल टर्नअराउंड से होल्डिंग पीरियड बढ़ सकता है, कैपिटल का नुकसान हो सकता है और प्रॉफिट कम हो सकता है। साथ ही, वैल्यूएशन पर दबाव और मेगा-डील्स की कमी के कारण आकर्षक एसेट्स के लिए कॉम्पिटिशन ज़्यादा है। एग्जिट के लिए IPO मार्केट कई एशियाई देशों में 2025 में लगभग बंद रहा।

आगे की राह

आगे चलकर, PE मैनेजर्स के लिए सही डील्स चुनना, पोर्टफोलियो पर पैनी नज़र रखना और अलग दिखने की स्पष्ट स्ट्रेटेजी बनाना ज़रूरी होगा। 2025 के अंत और 2026 में डील और एग्जिट एक्टिविटी जारी रहने की उम्मीद है। लेकिन भविष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि फर्म्स कॉम्प्लेक्स ऑपरेशनल बदलावों को कितनी अच्छी तरह मैनेज कर पाती हैं, AI जैसी टेक्नोलॉजी का उपयोग कर पाती हैं और बाहरी व आंतरिक रिस्क को प्रभावी ढंग से संभाल पाती हैं। मार्केट अब उन फर्म्स को ज़्यादा तवज्जो देगा जो ऑपरेशंस के ज़रिए रियल वैल्यू क्रिएट कर सकें।

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