पूर्व चुनाव आयुक्त Ashok Lavasa ने चुनाव आयोग की 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' प्रक्रिया पर कानूनी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि ERO-Net के केंद्रीकरण से पारदर्शिता प्रभावित हो रही है और यह संस्थागत विश्वसनीयता के लिए बड़ा जोखिम है।
पूर्व चुनाव आयुक्त Ashok Lavasa ने हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' प्रक्रियाओं की कानूनी वैधता पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए हैं। उन्होंने प्रशासनिक बदलावों, विशेषकर वोटर लिस्ट मैनेजमेंट के केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई है, जो उनके अनुसार कानूनी ढांचे को दरकिनार कर सकता है।\n\nविवाद के केंद्र में ERO-Net सिस्टम है, जो चुनावी पंजीकरण के लिए एक सेंट्रलाइज्ड प्लेटफॉर्म है। भारतीय कानून के तहत, इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स के पास वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने का विशेष वैधानिक अधिकार होता है। Lavasa ने चेतावनी दी है कि यदि तकनीकी केंद्रीकरण इन अधिकारियों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन से रोकता है, तो इससे प्रक्रियात्मक खामियां पैदा हो सकती हैं। उन्होंने गोवा का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां अधिकारियों को योग्य मतदाताओं के नाम जोड़ने से रोकने की खबरें सामने आई थीं, जिससे प्रशासनिक दक्षता और वैधानिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन पर सवाल उठ रहे हैं।\n\nआंतरिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव भी जांच के दायरे में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्तमान चुनाव आयुक्त Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने 10 महीनों की अवधि में 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। Lavasa ने कहा कि आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या इन आंतरिक संचारों पर निर्णय लेते समय विचार किया गया था या उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इन मतभेदों को कैबिनेट सचिव तक क्यों भेजा गया, जो चुनाव आयोग के लिए एक असामान्य कदम है।\n\nLavasa का मानना है कि इन आंतरिक संप्रेषणों के सार्वजनिक प्रकटीकरण के बिना, संस्थान की विश्वसनीयता को खतरा हो सकता है। यह स्थिति मजबूत 'चेक एंड बैलेंस' की आवश्यकता को दर्शाती है ताकि प्रशासनिक कार्रवाई कानूनी जनादेश के अनुरूप बनी रहे। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या चुनाव आयोग इन आंतरिक विवादों और कानूनी चिंताओं पर कोई औपचारिक स्पष्टीकरण जारी करेगा या नहीं।
