Amazon Thane Data Centre: पानी के इस्तेमाल पर घिरी Amazon, स्थानीय लोगों ने उठाए सवाल

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AuthorMehul Desai|Published at:
Amazon Thane Data Centre: पानी के इस्तेमाल पर घिरी Amazon, स्थानीय लोगों ने उठाए सवाल

Thane के Balkum इलाके में बन रहे Amazon के नए डेटा सेंटर पर स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं। कंपनी द्वारा पानी की खपत के अलग-अलग आंकड़े सामने आने से जल संकट और इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। समुदाय ने एनवायरनमेंट क्लीयरेंस और कूलिंग सिस्टम पर पारदर्शिता की मांग की है।

पानी की खपत पर घपला?

Thane के स्थानीय निवासी समूह 'WakeUp Thanekars' ने Amazon पर अपने Balkum स्थित डेटा सेंटर के लिए पानी की ज़रूरत को लेकर गलत जानकारी देने का आरोप लगाया है। मामला तीन अलग-अलग आंकड़ों के सामने आने के बाद गरमाया है, जिससे प्रोजेक्ट के एनवायरनमेंटल फुटप्रिंट और स्थानीय जल स्रोतों पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

समुदाय समूह के मुताबिक, कंपनी के एक इंटरनल फैक्ट शीट में डेटा सेंटर की हर दिन करीब 10,000 लीटर (0.01 MLD) पानी की खपत का अनुमान लगाया गया है। लेकिन, स्टेट लेवल एक्सपर्ट अप्रैजल कमेटी (State Level Expert Appraisal Committee) को अगस्त 2025 में दी गई अर्ज़ियों में 125 KLD की ज़रूरत बताई गई थी। इससे भी बड़ी बात यह है कि Thane म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (TMC) ने इस फैसिलिटी के लिए 12 MLD (यानी 12 मिलियन लीटर प्रति दिन) पानी आवंटित किया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ये आंकड़े आपस में मेल नहीं खाते और 12 MLD का आवंटन, कंपनी के अपने अनुमान से कहीं ज़्यादा है।

कूलिंग सिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव

सिर्फ पानी के आंकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि डेटा सेंटर के ऑपरेशन के तकनीकी पहलुओं पर भी बहस छिड़ गई है। खबर है कि यह फैसिलिटी ऐसे कूलिंग सिस्टम पर काम करेगी जो 29.4 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने पर पानी आधारित इवेपोरेटिव कूलिंग (evaporative cooling) का इस्तेमाल करेगा। Thane का औसत तापमान अक्सर इस सीमा से ऊपर रहता है, इसलिए लोगों को डर है कि यह सेंटर बड़े पैमाने पर पानी कूलिंग के लिए इस्तेमाल करेगा। इससे इलाके में पहले से मौजूद 30 MLD के जल घाटे (water deficit) की समस्या और बढ़ सकती है।

प्रोजेक्ट की मंज़ूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि पानी, सीवर और ड्रेनेज के लिए ज़रूरी नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जैसे एनवायरनमेंट क्लीयरेंस डॉक्यूमेंट सरकारी पोर्टल PARIVESH पर आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा, प्रोजेक्ट की कुल 422 MW की बिजली की ज़रूरत ने भी रीजनल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ने वाले दबाव को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बढ़ती सामुदायिक और रेगुलेटरी जांच

यह घटना भारत में बड़े इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स की कम्युनिटी-लेड मॉनिटरिंग के बढ़ते चलन को दर्शाती है। जैसे-जैसे डेटा सेंटर डिजिटल सेवाओं के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनते जा रहे हैं, उनकी बिजली और पानी की भारी खपत पर भी ज़्यादा जांच हो रही है। स्थानीय सांसद नरेश म्हास्के (Naresh Mhaske) जैसे प्रतिनिधियों ने संकेत दिया है कि इन चिंताओं को संसद तक उठाया जा सकता है।

निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स के लिए, कंपनी का इन विसंगतियों पर क्या जवाब आता है और वेरिफाइड कंप्लायंस रिपोर्ट्स कितनी उपलब्ध होती हैं, यह देखना अहम होगा। फैसिलिटी के एनवायरनमेंट क्लीयरेंस स्टेटस, कूलिंग टेक्नोलॉजी की डिटेल्स और म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन से पानी के आवंटन की पुष्टि, प्रोजेक्ट की टाइमलाइन और संभावित रेगुलेटरी बाधाओं का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.