भारत के छोटे एल्युमीनियम निर्माताओं के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। इंपोर्ट पैरिटी प्राइसिंग (Import Parity Pricing) के कारण उन्हें कच्चे माल के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ रहे हैं, जिससे उनके मुनाफे पर भारी असर पड़ रहा है। देश भर में **3,500** से अधिक डाउनस्ट्रीम यूनिट्स के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन गई है।
इंपोर्ट प्राइसिंग का मार्जिन पर असर
भारत में एल्युमीनियम बनाने वाली छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों (MSMEs) की हालत इन दिनों खस्ताहाल है। वजह है घरेलू बाजार में एल्युमीनियम की कीमतों का तय होने का तरीका, जिसे 'इंपोर्ट पैरिटी प्राइसिंग' कहा जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ये डाउनस्ट्रीम यूनिट्स, जो उद्योग में सबसे ज्यादा रोजगार देती हैं, इस प्राइसिंग सिस्टम के कारण नुकसान झेल रही हैं।
असल में, घरेलू एल्युमीनियम उत्पादक अक्सर अपने उत्पादों की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात होने वाले एल्युमीनियम की कीमत के बराबर रखते हैं। इसमें कस्टम ड्यूटी का भी बोझ शामिल होता है, भले ही माल देश में ही बना हो। इससे उन निर्माताओं के लिए कच्चे माल की लागत बढ़ जाती है जो एल्युमीनियम का इस्तेमाल पावर ट्रांसमिशन, रेलवे और इलेक्ट्रिक व्हीकल जैसे सेक्टर्स के लिए सामान बनाने में करते हैं। इन कंपनियों के मुनाफे का मार्जिन पहले से ही कम होता है, ऐसे में बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डालना मुश्किल हो जाता है। इससे वे विदेशी सामानों के मुकाबले कम प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।
टैरिफ का उलझा जाल
इंडस्ट्री एक उलटी ड्यूटी संरचना (Inverted Duty Structure) का भी सामना कर रही है, जहां प्राथमिक एल्युमीनियम पर ज्यादा कस्टम ड्यूटी लगती है, जबकि तैयार एल्युमीनियम उत्पादों पर कम। इसके अलावा, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स के तहत, वहां से तैयार माल बिना किसी ड्यूटी के भारत आ जाता है। इस वजह से घरेलू MSMEs की स्थिति और खराब हो जाती है। मामला इतना गंभीर है कि कच्चा एल्युमीनियम देश में खरीदने से ज्यादा महंगा पड़ता है, जितना कि तैयार उत्पाद को इंपोर्ट करना। यह स्थानीय वैल्यू-एडेड मैन्युफैक्चरिंग को दंडित करने जैसा है।
आगे की राह और सरकारी नीतियां
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि प्राथमिक एल्युमीनियम पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को धीरे-धीरे कम करके शून्य किया जा सकता है। इससे कंपनियों को राहत मिलेगी। अन्य सुझावों में ट्रेड एग्रीमेंट्स के तहत सख्त वेरिफिकेशन प्रक्रियाएं शामिल हैं ताकि सस्ते इंपोर्ट को रोका जा सके। साथ ही, ड्यूटी इनवर्जन को ठीक करके 'मेक इन इंडिया' पहल को बढ़ावा देने की बात कही गई है। निवेशकों के लिए, इन एल्युमीनियम यूनिट्स का भविष्य सरकारी व्यापार नीतियों पर निर्भर करेगा। कस्टम ड्यूटी में बदलाव, सस्ते इंपोर्ट के खिलाफ व्यापारिक उपाय और उत्पादकों के लिए ऊर्जा लागत में सहायता जैसी खबरों पर नजर रखना जरूरी होगा, ताकि यह समझा जा सके कि ये कंपनियां अपनी खोई हुई प्रतिस्पर्धात्मकता और वित्तीय स्थिरता कैसे हासिल कर पाती हैं।
