भारत में व्हाइट-कॉलर नौकरियों की ग्रोथ धीमी पड़ गई है। कंपनियां अब AI और ऑटोमेशन पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, जिससे बड़े पैमाने पर हायरिंग की रफ्तार कम हो गई है। TeamLease Services के मुताबिक, AI स्किल्स की डिमांड तो बढ़ रही है, लेकिन यह पारंपरिक नौकरियों की जगह नहीं ले पा रही। निवेशकों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है।
क्या हुआ है?
भारत में व्हाइट-कॉलर (White-collar) नौकरियों की ग्रोथ में बड़ी सुस्ती आ गई है। अब कंपनियां अपने कर्मचारियों के मैनेजमेंट के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन की तरफ ज्यादा झुक रही हैं। TeamLease Services की रिपोर्ट बताती है कि कंपनियां बड़े पैमाने पर हायरिंग के बजाय 'वर्कफोर्स रैशनलाइजेशन' पर ध्यान दे रही हैं, यानी मौजूदा स्टाफ और ऑपरेशनल एफिशिएंसी को बेहतर बनाना। इस ट्रेंड के चलते कई सेक्टर्स में हायरिंग की रफ्तार काफी कम हो गई है।
Naukri JobSpeak इंडेक्स के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मई में व्हाइट-कॉलर हायरिंग ग्रोथ घटकर सिर्फ 1% रह गई। यह साल की शुरुआत में देखी गई 12% ग्रोथ से काफी कम है। हालांकि, बाजार पर दबाव के बावजूद, AI और मशीन लर्निंग जैसी खास स्किल्स की डिमांड 22% सालाना बढ़ी है।
निवेशकों के लिए यह क्यों अहम है?
TeamLease Services और इसी तरह की दूसरी स्टाफिंग और रिक्रूटमेंट कंपनियों के लिए यह ट्रेंड बहुत मायने रखता है। कई कंपनियों का बिजनेस मॉडल 'वॉल्यूम हायरिंग' पर टिका होता है, जिसमें वे IT, मैन्युफैक्चरिंग और रिटेल जैसे सेक्टर्स में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को प्लेस करती हैं।
जब कंपनियां मास एक्सपेंशन की बजाय ऑटोमेशन और ऑप्टिमाइजेशन की तरफ मुड़ती हैं, तो एंट्री-लेवल और मिड-लेवल की उन नौकरियों की संख्या कम हो जाती है, जिन्हें स्टाफिंग फर्म्स आमतौर पर भरती हैं। AI जैसी खास प्रतिभाओं की हाई डिमांड होने के बावजूद, ऐसी भूमिकाएं अक्सर कम होती हैं और इनके लिए हायरिंग के अलग तरीके हो सकते हैं। इससे स्टाफिंग फर्म्स के लिए पहले की तरह बल्क हायरिंग से रेवेन्यू कमाना मुश्किल हो जाता है।
बिजनेस पर असर
निवेशकों को यह देखना होगा कि यह बदलाव स्टाफिंग कंपनियों की फाइनेंशियल स्थिति को कैसे प्रभावित करता है। यह सेक्टर आमतौर पर कम मार्जिन पर काम करता है और प्रॉफिट बढ़ाने के लिए स्केल पर निर्भर करता है। अगर कंपनियां हेडकाउंट बढ़ाने की बजाय AI इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना चुनती हैं, तो 'जनरल स्टाफिंग' सेगमेंट - जो कई कंपनियों के लिए रेवेन्यू का बड़ा जरिया है - ग्रोथ के दबाव में आ सकता है।
AI-संबंधित हायरिंग में बढ़ोतरी रिक्रूटमेंट के लिए प्रीमियम सेगमेंट तो प्रदान करती है, लेकिन इसमें अक्सर ज्यादा लागत और लंबा हायरिंग प्रोसेस शामिल होता है। यह एक ऐसा दौर है जहां स्टाफिंग फर्म्स को वॉल्यूम-आधारित हायरिंग पार्टनर से स्पेशलाइज्ड टैलेंट प्रोवाइडर बनने की अपनी क्षमता साबित करनी होगी।
सेक्टर का संदर्भ
सभी सेक्टर्स पर इसका एक जैसा असर नहीं पड़ रहा है। यह सुस्ती उन इंडस्ट्रीज में ज्यादा दिख रही है जहां ऑटोमेशन से दोहराए जाने वाले कामों को आसानी से बदला जा सकता है। हालांकि, कुछ जगहों पर ग्रोथ अभी भी बनी हुई है। उदाहरण के लिए, बीमा (Insurance) सेक्टर में हायरिंग 19% बढ़ी है, जबकि ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs), बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) फर्म्स और हेल्थकेयर सेक्टर में अभी भी मजबूती दिख रही है। निवेशकों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि कौन सी कंपनियां IT/टेक सेगमेंट में ज्यादा एक्सपोज्ड हैं और कौन सी बीमा या हेल्थकेयर जैसे स्थिर वर्टिकल से ज्यादा बिजनेस लेती हैं।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
मानव संसाधन और स्टाफिंग सेक्टर में निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि जनरल स्टाफिंग बिजनेस में रेवेन्यू ग्रोथ रेट क्या है। मैनेजमेंट की 'Billable Headcount' पर कमेंट्री पर ध्यान दें और देखें कि क्या कंपनियां मास हायरिंग में गिरावट को हाई-मार्जिन, स्पेशलाइज्ड प्लेसमेंट से सफलतापूर्वक पूरा कर पा रही हैं।
इसके अलावा, प्रॉफिट मार्जिन के ट्रेंड्स पर भी नजर रखें। अगर स्टाफिंग फर्म्स को खास AI रोल्स के लिए ट्रेनिंग और रिक्रूटमेंट पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है, तो इससे उनके बॉटम लाइन पर दबाव आ सकता है। अंत में, व्यापक भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में ऑटोमेशन को अपनाने की गति पर नजर रखने से यह पता चल सकता है कि हायरिंग में यह सुस्ती एक अस्थायी समायोजन है या कंपनियों के मानव संसाधन रणनीति में एक लंबा संरचनात्मक बदलाव।
