Association for Democratic Reforms (ADR) की हालिया रिपोर्ट ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। साल 2022 से 2026 के बीच 111 सांसदों और विधायकों ने अपनी पार्टी बदली है, जो देश की राजनीतिक स्थिरता और बिजनेस पॉलिसी पर असर डाल सकती है।
गवर्नेंस और निवेश पर असर
लोकतांत्रिक सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था Association for Democratic Reforms (ADR) की रिपोर्ट बताती है कि इस दलबदल की संस्कृति से गवर्नेंस फ्रेमवर्क प्रभावित होता है। निवेशकों के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि बार-बार होने वाली राजनीतिक उठापटक से पॉलिसी के लागू होने और प्रोजेक्ट अप्रूवल की प्रक्रिया में देरी हो सकती है, जो बिजनेस की स्टेबिलिटी को सीधे प्रभावित करती है।
राज्यों का हाल और प्रमुख दल
ADR की रिपोर्ट के अनुसार, नागालैंड में सबसे ज्यादा 32 मामले सामने आए हैं, जिसमें मुख्य रूप से Nationalist Democratic Progressive Party और Naga People's Front के नेता शामिल रहे। इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर आता है, जहाँ 20 नेता पाला बदलकर Nationalist Citizens Party of India में शामिल हुए। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस दौरान 29 नेताओं को अपनी पार्टी में जगह दी है।
भविष्य की राह और सुझाव
इस राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए ADR ने सख्त सिफारिशें की हैं। संस्था का कहना है कि दलबदल से जुड़े मामलों के फैसले की शक्ति पीठासीन अधिकारियों (Presiding Officers) से हटाकर राष्ट्रपति या राज्यपालों को दी जानी चाहिए, जो Election Commission की सलाह पर काम करें। साथ ही, दल बदलने वाले नेताओं के लिए सार्वजनिक पद संभालने पर रोक लगाने और याचिकाओं के निपटारे के लिए समय सीमा तय करने की भी मांग उठी है। निवेशकों के लिए अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में Anti-Defection Laws को लेकर सरकार क्या कड़े कदम उठाती है, क्योंकि इसी पर पॉलिसी की निरंतरता निर्भर करेगी।
