पिछले 12 सालों में भारतीय इक्विटी बाज़ार FII (फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स) पर निर्भरता से DII (डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स) पर हावी हो गया है। जहाँ निफ्टी इंडेक्स दोगुना हुआ, वहीं निफ्टी मिडकैप जैसे ब्रॉडर मार्केट्स लगभग 5 गुना बढ़ गए, जो करेंसी में गिरावट के बावजूद धन सृजन का एक दशक रहा।
क्या हुआ?
साल 2014 से 2026 के बीच, भारतीय शेयर बाज़ार में मालिकाना हक और ग्रोथ ड्राइवर्स दोनों के लिहाज़ से एक बड़ा बदलाव आया। जहाँ निफ्टी 50 जैसे प्रमुख इंडेक्स इस दौरान दोगुना से ज़्यादा बढ़े, वहीं असल कहानी ब्रॉडर मार्केट की रही। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स ने 4.92 गुना का ज़बरदस्त रिटर्न दिया, जो लार्ज-कैप इंडेक्स से कहीं ज़्यादा बेहतर प्रदर्शन था। इस दौर में रिटेल निवेशकों की भागीदारी, सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) में बढ़ोतरी और डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशंस का बढ़ता प्रभाव साफ दिखाई दिया।
डोमेस्टिक कैपिटल का उदय
भारत के मार्केट परिदृश्य में सबसे बड़ा बदलाव फॉरेन और डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स के बीच पावर बैलेंस का रहा है। पहले भारतीय बाज़ार फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर (FII) के फ्लो पर बहुत ज़्यादा निर्भर करते थे। लेकिन, पिछले दशक में एक स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिला। FIIs नेट सेलर्स बने रहे और 2014 के बाद से उन्होंने ₹13.4 लाख करोड़ से ज़्यादा की निकासी की। इस गैप को डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने भरा - जिनमें म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस कंपनियाँ और पेंशन फंड शामिल हैं। DIIs बाज़ार की रीढ़ बने और उन्होंने लगभग ₹26 लाख करोड़ का निवेश किया। इस डोमेस्टिक सपोर्ट ने बाज़ार को मजबूती दी और ग्लोबल बिकवाली और भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद इसे मज़बूत बनाए रखा।
मिडकैप ने ही क्यों की ज़्यादातर रैली?
मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स का शानदार प्रदर्शन - क्रमशः 4.92 गुना और 2.71 गुना की बढ़ोतरी - भारत की ग्रोथ स्टोरी के व्यापक होने को दर्शाता है। इन्वेस्टर्स टॉप 50 ब्लू-चिप कंपनियों की सुरक्षा से आगे बढ़कर फाइनेंशियल सर्विसेज और ऑर्गेनाइज्ड रिटेल जैसे सेक्टर्स में ज़्यादा ग्रोथ की संभावना तलाशने लगे। Bajaj Finance और Trent जैसी कंपनियों ने इस धन सृजन का स्पष्ट उदाहरण पेश किया, जिन्होंने 40 गुना से ज़्यादा रिटर्न दिया। यह बदलाव बढ़ते डिस्क्रिशनरी खर्च (discretionary spending) और भारतीय अर्थव्यवस्था के फॉर्मलाइजेशन (formalization) से प्रेरित था, जिसने छोटी, हाई-ग्रोथ वाली कंपनियों को तेज़ी से स्केल करने में मदद की।
करेंसी की हकीकत
जहां इक्विटी रिटर्न मज़बूत थे, वहीं भारतीय रुपये में एक महत्वपूर्ण गिरावट भी दर्ज की गई। इस दशक में, डॉलर के मुकाबले रुपया 61% से ज़्यादा गिरा, जो लगभग 59 से बढ़कर 95 के पार चला गया। यह गिरावट ग्लोबल फैक्टर्स के कारण हुई, जिसमें डॉलर का मज़बूत होना, लगातार ट्रेड इम्बैलेंस और कैपिटल फ्लो की अस्थिरता शामिल है। इन्वेस्टर्स के लिए, यह एक रिमाइंडर है कि लंबे समय में इन्फ्लेशन और करेंसी के रुझान को ध्यान में रखना ज़रूरी है, क्योंकि डोमेस्टिक इक्विटी की कमाई को समय के साथ परचेजिंग पावर में बदलाव के लिए एडजस्ट किया जाता है।
सेक्टर ट्रेंड्स और जोखिम
सभी सेक्टर्स का प्रदर्शन एक जैसा नहीं रहा। जहाँ फाइनेंशियल और कंजम्पशन-लिंक्ड स्टॉक्स मुख्य धन सृजनकर्ता थे, वहीं अन्य को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। FMCG स्टॉक्स में मामूली बढ़त देखी गई, जिस पर अक्सर हाई वैल्यूएशन और धीमी डिमांड ग्रोथ का दबाव रहा। वहीं, डिफेंस सेक्टर में 2022 के आसपास एक महत्वपूर्ण री-रेटिंग देखी गई। निवेशकों के लिए एक बड़ा जोखिम उन सेगमेंट्स में हाई वैल्यूएशन बना हुआ है जहाँ तेज़ी से रैली देखी गई है। जब मिडकैप और स्मॉलकैप अपने ऐतिहासिक औसत की तुलना में काफी प्रीमियम पर ट्रेड करते हैं, तो मार्जिन ऑफ सेफ्टी (margin of safety) कम हो जाता है, जिससे वे मार्केट में गिरावट के दौरान तेज़ करेक्शन के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो जाते हैं।
आगे क्या देखना चाहिए?
आगे चलकर, डोमेस्टिक इनफ्लो की स्थिरता पर ध्यान केंद्रित रहेगा। सिस्टेमेटिक इन्वेस्टिंग की ओर झुकाव ने लिक्विडिटी का एक पॉजिटिव साइकिल बनाया है, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि बाज़ार अब पहले से कहीं ज़्यादा डोमेस्टिक सेंटीमेंट के प्रति संवेदनशील है। निवेशकों को तीन मुख्य क्षेत्रों पर नज़र रखनी चाहिए: DII इनफ्लो की रफ़्तार, जो बाज़ार को सहारा दे रही है; कंजम्पशन सेक्टर्स में प्रॉफिट मार्जिन ट्रेंड्स, जो अर्बन और रूरल डिमांड का संकेत देते हैं; और इंपोर्ट-डिपेंडेंट इंडस्ट्रीज़ पर गिरते रुपये का असर। हालांकि ब्रॉडर मार्केट ने लचीलापन दिखाया है, लेकिन ग्रोथ का अगला चरण सिर्फ लिक्विडिटी-ड्रिवन री-रेटिंग के बजाय अर्निंग्स क्वालिटी (earnings quality) पर निर्भर करेगा।
