एक 26 साल के लंबे अध्ययन से पता चला है कि 70% इक्विटी, 15% डेट और 15% गोल्ड वाले पोर्टफोलियो ने 92% सात-साल की अवधियों में सालाना 10% या उससे ज़्यादा रिटर्न दिया है। यह रणनीति Nifty 50 इंडेक्स के बराबर प्रदर्शन करती है, लेकिन बाज़ार की गिरावट में ज़्यादा स्थिरता और कम नुकसान देती है।
26 साल की स्टडी का कमाल: 70:15:15 का फॉर्मूला
अगर आप भी निवेश के ज़रिए लगातार अच्छी कमाई करना चाहते हैं, तो एक 26 साल का अध्ययन (2000 से 2026) आपके लिए एक बड़ा सीक्रेट खोल सकता है। यह स्टडी बताती है कि सिर्फ इक्विटी में पैसा लगाने के बजाय, अगर आप अपने पोर्टफोलियो को 70% स्टॉक (इक्विटी), 15% डेट (कर्ज) और 15% गोल्ड (सोना) में बांटते हैं, तो आपको ज़बरदस्त नतीजे मिल सकते हैं। इस खास मिक्स ने अध्ययन की गई 26 सालों की अवधि में 92% सात-साल की अवधियों में कम से कम 10% सालाना रिटर्न दिया है।
Nifty 50 से भी बेहतर स्टेबिलिटी!
सोचिए, यह रणनीति सिर्फ Nifty 50 टोटल रिटर्न इंडेक्स की तरह ही लंबी अवधि में 15% तक का रिटर्न दे सकती है, लेकिन एक बड़े फायदे के साथ – ये है बाज़ार की उठापटक में ज़्यादा स्थिरता। जहाँ Nifty 50 इंडेक्स को बड़े नुकसान झेलने पड़े, वहीं इस 70:15:15 वाले पोर्टफोलियो का सबसे खराब सात-साल का पीरियड भी सालाना 7% रिटर्न देकर गया। बाज़ार की सबसे बड़ी गिरावट के समय, जहाँ इक्विटी इंडेक्स 59% तक गिरे, वहीं इस डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो में गिरावट सिर्फ 40% तक सीमित रही।
हर एसेट क्लास का अपना रोल
इस बेहतरीन प्रदर्शन के पीछे हर एसेट क्लास का अपना अहम योगदान है। इक्विटी जहां ग्रोथ का इंजन है, वहीं डेट बाज़ार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा देता है। सोना, खासकर अनिश्चितता और महंगाई के दौर में, वैल्यू को बनाए रखने में मदद करता है। इस रणनीति की सफलता का एक और बड़ा राज़ है - एनुअल रीबैलेंसिंग। यानी, हर साल अपने पोर्टफोलियो को वापस 70:15:15 के अनुपात में लाना। इससे आप उन एसेट्स को बेचते हैं जो ज़्यादा बढ़ गए और उन एसेट्स को खरीदते हैं जो सस्ते हो गए, ताकि आपका पोर्टफोलियो किसी एक एसेट में ज़रूरत से ज़्यादा न बढ़ जाए।
क्या यह आपके लिए है?
हालांकि, यह मॉडल डायवर्सिफिकेशन का एक मज़बूत उदाहरण है, लेकिन यह हर किसी के लिए एक जैसा नहीं है। आपके लिए कौन सा पोर्टफोलियो सही है, यह आपके फाइनेंशियल लक्ष्यों, पैसे की ज़रूरत कब है, और आप कितना रिस्क ले सकते हैं, इस पर निर्भर करता है। एक युवा इन्वेस्टर ज़्यादा इक्विटी रख सकता है, जबकि रिटायरमेंट के करीब वाला व्यक्ति डेट की स्थिरता को तरजीह देगा। आप भी अपने पोर्टफोलियो की तुलना इस मॉडल से करके देख सकते हैं कि क्या यह आपके लिए सही ग्रोथ और सुरक्षा का संतुलन दे रहा है। अगला कदम यह देखना होगा कि क्या आपके मौजूदा फंड्स और स्टॉक्स इस लक्ष्य के अनुसार हैं और क्या आप एनुअल रीबैलेंसिंग के लिए अनुशासित हैं।
