ऑप्शन खरीदने वाले अक्सर बाज़ार की दिशा सही होने के बावजूद नुकसान उठा लेते हैं। एक्सपर्ट शुभम अग्रवाल बताते हैं कि स्ट्राइक चुनने, इम्प्लाइड वोलेटिलिटी और टाइम डिके जैसे 5 ज़रूरी फैक्टर्स पर कैसे ध्यान दें।
बहुत से रिटेल ट्रेडर्स स्टॉक या इंडेक्स की दिशा का सही अंदाज़ा लगाने के बावजूद ऑप्शन ट्रेडिंग में नुकसान कर बैठते हैं। यह आम समस्या दिखाती है कि डेरिवेटिव्स मार्केट में सफलता के लिए सिर्फ दिशा का सही अनुमान काफी नहीं है; इसके लिए सही कॉन्ट्रैक्ट चुनने और एंट्री को टाइम करने का एक डिसिप्लिन वाला फ्रेमवर्क ज़रूरी है।
ऑप्शन चुनने के लिए ज़रूरी फैक्टर्स
किसी भी ट्रेड में घुसने से पहले, आपकी कनविक्शन (विश्वास) की स्ट्रेंथ का साफ-साफ आंकलन करना ज़रूरी है। ऑप्शंस 'वेस्टिंग एसेट्स' होते हैं, यानी वे हर दिन टाइम डिके, जिसे थीटा (Theta) भी कहते हैं, के कारण वैल्यू खोते हैं। अगर आपकी दिशा वाली राय में दम नहीं है या अनुमानित मूव छोटा है, तो प्रीमियम में होने वाली रोज़ की कटौती आसानी से किसी भी संभावित मुनाफे पर भारी पड़ सकती है।
इम्प्लाइड वोलेटिलिटी (Implied Volatility) या IV एक और बड़ा फैक्टर है जो सीधे तौर पर आपके ऑप्शन की कीमत को अफेक्ट करता है। जब IV हाई होती है, तो ऑप्शन प्रीमियम महंगे हो जाते हैं क्योंकि मार्केट बड़े प्राइस स्विंग्स की उम्मीद करता है। भले ही स्टॉक आपकी अनुमानित दिशा में चला जाए, IV में बाद में होने वाली गिरावट - जिसे अक्सर 'वोलेटिलिटी क्रश' कहा जाता है - आपके ऑप्शन की वैल्यू को काफी कम कर सकती है, जिससे कभी-कभी तब भी नुकसान होता है जब आपका मार्केट व्यू सही था।
सही कॉन्ट्रैक्ट का चुनाव
शुरुआती लोग अक्सर 'आउट-ऑफ-द-मनी' (Out-of-the-Money) ऑप्शंस की ओर खिंचे चले जाते हैं क्योंकि वे सस्ते लगते हैं। हालांकि, इन ऑप्शंस का डेल्टा (Delta) कम होता है, जिसका मतलब है कि वे अंडरलाइंग स्टॉक की प्राइस मूवमेंट पर धीमी प्रतिक्रिया देते हैं। जो लोग दिशात्मक मूव का फायदा उठाना चाहते हैं, उनके लिए 'एट-द-मनी' (At-the-Money) या थोड़ा 'इन-द-मनी' (In-the-Money) ऑप्शंस आमतौर पर एसेट की प्राइस मूवमेंट में बेहतर पार्टिसिपेशन देते हैं।
इसके अलावा, एक्सपायरी तक बचा हुआ समय ट्रेड के रिस्क प्रोफाइल का एक अहम हिस्सा है। शॉर्ट-टर्म ऑप्शंस भले ही सस्ते लगें, लेकिन वे सबसे तेज़ टाइम डिके का सामना करते हैं। ट्रेडर्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके पास अपनी थ्योरी को पूरा होने के लिए पर्याप्त समय हो, न कि सिर्फ एक तेज़, तत्काल मूव पर निर्भर रहें। ट्रेड की अनुमानित अवधि के अनुरूप एक्सपायरी डेट चुनना इस जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
रिस्क और रिवॉर्ड का मैनेजमेंट
आखिर में, हर ट्रेड को उसके रिस्क-रिवॉर्ड रेश्यो से मापा जाना चाहिए। ऐसी पोजीशन लेना जहाँ संभावित नुकसान, संभावित मुनाफे से ज़्यादा हो, एक ऐसी स्ट्रैटेजी है जो लंबे समय में शायद ही कभी सफल होती है। एक डिसिप्लिन्ड ट्रेडर को यह वेरिफाई करना चाहिए कि ट्रेड सेटअप एक फेवरेबल बैलेंस दे रहा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि संभावित मुनाफ़ा ही रिस्क में डाले गए कैपिटल को जस्टिफाई करे। ऑर्डर एग्जीक्यूट करने से पहले इस चेकलिस्ट का पालन करने से ट्रेडर्स को आम गलतियों से बचने और डेरिवेटिव्स मार्केट में एक ज़्यादा सस्टेनेबल और प्रोबेबिलिटी-बेस्ड अप्रोच बनाने पर फोकस करने में मदद मिल सकती है।
