वित्तीय वर्ष 2026 में भारतीय कंपनियों के टॉप एग्जीक्यूटिव्स की कमाई रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है। Nifty 50 की लगभग 20% कंपनियों के CEOs और मैनेजिंग डायरेक्टर्स ने साल भर में ₹50 करोड़ से ज़्यादा की कमाई की है। यह बढ़ोतरी सिर्फ बेस सैलरी में नहीं, बल्कि परफॉरमेंस-लिंक्ड इंसेंटिव्स, खासकर स्टॉक ऑप्शंस के कारण हुई है।
एग्जीक्यूटिव सैलरी में बड़ा उछाल
साल 2026 के लिए Nifty 50 कंपनियों की एनुअल रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 20% CEOs और मैनेजिंग डायरेक्टर्स की कुल कमाई ₹50 करोड़ से ज़्यादा रही। यह वृद्धि केवल फिक्स्ड सैलरी में नहीं, बल्कि परफॉरमेंस-बेस्ड इंसेंटिव्स जैसे ESOPs (Employee Stock Option Plans) और RSUs (Restricted Stock Units) के कारण ज़्यादा हुई है।
टेक और इंफ्रा सेक्टर में सबसे ज़्यादा कमाई
टेक्नोलॉजी सेक्टर, जो ग्लोबल टैलेंट के लिए बड़ी प्रतिस्पर्धा में रहता है, सबसे ज़्यादा रेमुनरेशन पैकेज दे रहा है। HCL Technologies के CEO सी. विजयकुमार ने ₹175 करोड़ ($18.13 मिलियन) की कुल कमाई के साथ टॉप पर रहे, जो पिछले साल से 67% ज़्यादा है। वहीं, L&T (Larsen & Toubro) के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर एस.एन. सुब्रमण्यन की सालाना कमाई ₹120.84 करोड़ रही, जिसमें 59% का इजाफा हुआ।
आईटी फर्मों के अलावा, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमोटिव और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में भी लीडर्स की पे-पैकेज में अच्छी ग्रोथ देखी गई है। हालांकि, रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी जैसे कुछ प्रमुख लीडर्स ने इस साल अपनी सैलरी लेने से इनकार कर दिया, जो विभिन्न कॉर्पोरेट ग्रुप्स की अलग-अलग पे स्ट्रेटेजी को दर्शाता है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
यह सैलरी स्ट्रक्चर निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण है। ज़्यादातर बड़े पे-पैकेज, खासकर जो स्टॉक ऑप्शंस पर आधारित होते हैं, CEO के हितों को शेयरहोल्डर्स के साथ जोड़ने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। लेकिन, इसका मतलब यह भी है कि अगर कंपनी परफॉरमेंस टारगेट्स को पूरा नहीं कर पाती, तो इन स्टॉक-बेस्ड इंसेंटिव्स की वैल्यू घट सकती है। इसके विपरीत, जब शेयर की कीमतें बढ़ती हैं, तो एग्जीक्यूटिव की कमाई भी तेज़ी से बढ़ती है, जो कभी-कभी जांच का विषय बन जाती है।
कॉर्पोरेट गवर्नेंस एक्सपर्ट्स अक्सर CEO की सैलरी और कंपनी के कर्मचारियों की मीडियन सैलरी के अनुपात पर नज़र रखते हैं। HCL Technologies जैसे कुछ मामलों में, यह अनुपात इतना ज़्यादा है कि यह कंपनी के अंदर आय असमानता पर सवाल खड़े करता है। ग्लोबल मार्केट में टॉप टैलेंट को बनाए रखने के लिए हाई-पे आम है, लेकिन भारतीय निवेशक अब यह देख रहे हैं कि क्या ये पैकेज सस्टेनेबल लॉन्ग-टर्म वैल्यू क्रिएशन से जुड़े हैं या सिर्फ शॉर्ट-टर्म शेयर प्राइस परफॉर्मेंस से।
