क्या आपने कभी अपने म्यूचुअल फंड फैक्टशीट में कैश बैलेंस को लेकर उलझन महसूस की है? यह कैश रिडेम्पशन के लिए जरूरी तो है, लेकिन इसका ज्यादा होना आपके रिटर्न पर असर डाल सकता है। जानें कब यह स्मार्ट रणनीति है और कब एक चेतावनी।
इक्विटी म्यूचुअल फंड्स का मुख्य काम पैसा शेयर बाजार में लगाना है। लेकिन अगर आप फैक्टशीट देखें, तो पाएंगे कि फंड कभी भी 100% निवेशित नहीं होता। अक्सर फंड मैनेजर पोर्टफोलियो का एक हिस्सा कैश या कैश इक्विवेलेंट में रखते हैं। निवेशक अक्सर सोचते हैं कि पूरा पैसा निवेश क्यों नहीं किया जा रहा?
कैश क्यों जरूरी है?
फंड मैनेजर को लिक्विडिटी बफर बनाए रखना होता है। जब निवेशक अपना पैसा निकालते हैं, तो फंड को तुरंत भुगतान करना पड़ता है। अगर सारा पैसा शेयरों में लगा हो, तो मैनेजर को बाजार में जल्दबाजी में शेयर बेचने पड़ सकते हैं, जिससे नुकसान की आशंका होती है। यह कैश रिडेम्पशन और ऑपरेशन्स के खर्च को संभालने का काम करता है।
सेबी (SEBI) के नियमों के तहत, यह पैसा खाली बैंक खाते में नहीं रखा जाता, बल्कि ट्रेजरी बिल (Treasury Bills) या सरकारी प्रतिभूतियों जैसे सुरक्षित विकल्पों में निवेश किया जाता है, जिस पर मामूली ब्याज भी मिलता है।
कब यह 'कैश ड्रैग' बनता है?
समस्या तब शुरू होती है जब यह हिस्सा बड़ा हो जाता है, जिसे फाइनेंस की भाषा में 'कैश ड्रैग' कहते हैं। अगर कोई फंड 10% से 15% तक कैश रखता है, तो वह बाजार की तेजी का फायदा नहीं उठा पाता। लंबे समय में यह आपके कुल रिटर्न को कम कर सकता है।
इंडेक्स फंड बनाम एक्टिव फंड
इंडेक्स फंड या ETF का लक्ष्य इंडेक्स की कॉपी करना होता है, इसलिए इनमें कैश लगभग शून्य होना चाहिए। अगर इसमें ज्यादा कैश है, तो यह अपने बेंचमार्क को ट्रैक करने में फेल हो सकता है। वहीं, एक्टिव फंड्स में मैनेजर बाजार के जोखिम को देखते हुए इसे एक डिफेंसिव रणनीति के तौर पर रख सकते हैं।
आपको क्या करना चाहिए?
सिर्फ एक महीने की फैक्टशीट देखकर फैसला न लें। हो सकता है फंड को हाल ही में बड़ा निवेश मिला हो जिसे अभी डिप्लॉय किया जाना बाकी हो। यदि आप 3 से 6 महीने तक लगातार ऊंचा कैश स्तर देखते हैं, तो तब जाकर फंड की गहराई से जांच करें कि क्या यह उसके मैंडेट के मुताबिक है या फिर रिटर्न में लगातार कमी ला रहा है।
