भारतीय निवेशक अक्सर ज्यादा डाइवर्सिफिकेशन के चक्कर में बहुत सारे म्यूचुअल फंड जमा कर लेते हैं। असल में, इससे पोर्टफोलियो में ओवरलैपिंग का रिस्क बढ़ जाता है और ज्यादा खर्च के कारण रिटर्न पर बुरा असर पड़ता है।
भारत में कई निवेशक यह मानकर चलते हैं कि पोर्टफोलियो में जितनी ज्यादा स्कीम होंगी, उनका निवेश उतना ही सुरक्षित और डाइवर्सिफाइड (Diversified) होगा। लेकिन हकीकत में, बहुत ज्यादा फंड्स का चुनाव करने से पोर्टफोलियो में 'क्लटर' (Clutter) पैदा हो जाता है, जो फायदे के बजाय नुकसान का कारण बनता है।
हिडन कंसंट्रेशन का खतरा
ज्यादा फंड्स रखने की सबसे बड़ी समस्या 'पोर्टफोलियो ओवरलैप' है। मान लीजिए आपने 5 अलग-अलग लार्ज-कैप फंड्स खरीदे हैं, तो इस बात की पूरी संभावना है कि उन सभी के टॉप 10 स्टॉक्स एक जैसे ही हों। इसे 'क्लोजेट इंडेक्सिंग' (Closet Indexing) कहते हैं। आप अलग-अलग फंड्स का एक्सपेंस रेश्यो (Expense Ratio) चुका रहे हैं, लेकिन वास्तव में आपका पैसा एक ही तरह के शेयरों में लगा हुआ है।
बढ़ते खर्च और टैक्स की मार
ज्यादा फंड्स मतलब ज्यादा मैनेजमेंट फीस। हर म्यूचुअल फंड स्कीम अपना सालाना एक्सपेंस रेश्यो वसूलती है। यदि आपके पास 10 फंड्स हैं, तो आप 10 अलग-अलग लेयर्स में फीस दे रहे हैं, जो लंबे समय में आपके वेल्थ क्रिएशन पर असर डालती है। इसके अलावा, लगातार फंड्स स्विच करने से कैपिटल गेन्स टैक्स का बोझ भी बढ़ता है, जो आपके नेट रिटर्न को कम कर देता है।
गोल-बेस्ड इन्वेस्टिंग ही सही रास्ता
निवेश का तरीका 'बेस्ट परफॉर्मिंग' फंड के पीछे भागने के बजाय अपने लाइफ गोल्स पर आधारित होना चाहिए। चाहे बच्चे की पढ़ाई हो, रिटायरमेंट हो या घर खरीदना, निवेश का फैसला अपने रिस्क प्रोफाइल और समय सीमा के हिसाब से लें। बेहतर होगा कि आप फंड ओवरलैप चेक करने वाले टूल्स का इस्तेमाल करें। अगर दो फंड्स में 80-90% तक एक जैसे शेयर हैं, तो उनमें से एक को हटाना ही बेहतर फैसला हो सकता है।
निवेशकों के लिए सलाह
पोर्टफोलियो को आसान रखें। लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप या इंडेक्स फंड्स का एक सही कॉम्बिनेशन ही काफी है। फंड हाउस की मंथली फैक्ट शीट देखें और चेक करें कि क्या आपका एसेट एलोकेशन आपके लॉन्ग-टर्म गोल्स से मेल खा रहा है या नहीं। याद रखें, फंड्स की संख्या से ज्यादा पोर्टफोलियो की क्वालिटी मायने रखती है।
