म्यूचुअल फंड में वितरकों का दबदबा: आखिर क्यों 70% निवेशक चुनते हैं 'रेगुलर प्लान'?

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AuthorMehul Desai|Published at:
म्यूचुअल फंड में वितरकों का दबदबा: आखिर क्यों 70% निवेशक चुनते हैं 'रेगुलर प्लान'?

कम लागत वाली डायरेक्ट म्यूचुअल फंड प्लान्स के बावजूद, भारतीय रिटेल निवेशक अभी भी वितरकों (Distributors) पर ज्यादा भरोसा करते हैं। लगभग **70%** इंडिविजुअल एसेट्स पर वितरकों का नियंत्रण बना हुआ है। डायरेक्ट प्लान्स में कमीशन नहीं लगता और ये ज्यादा रिटर्न देते हैं, लेकिन ज्यादातर निवेशक प्रोफेशनल सलाह और सपोर्ट के लिए वितरकों की मदद लेते हैं।

Detailed Coverage

भारतीय म्यूचुअल फंड का बाजार

भारतीय म्यूचुअल फंड (MF) इंडस्ट्री का एसेट बेस बढ़कर करीब ₹81.6 लाख करोड़ हो गया है (मई 2026 तक)। डायरेक्ट प्लान्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की लोकप्रियता बढ़ी है, लेकिन निवेशकों के पैसे बांटने का तरीका अलग-अलग है। इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स, जैसे बैंक और कॉर्पोरेशन, सीधे प्लान्स को तरजीह देते हैं और 70% से 94% तक का निवेश इसी रास्ते से करते हैं।

लेकिन, इंडिविजुअल और हाई-नेट-वर्थ इन्वेस्टर्स की कहानी बिल्कुल अलग है। इनमें से ज्यादातर अभी भी वितरकों के जरिए ही निवेश कर रहे हैं।

कमीशन की लागत का लंबी अवधि की वेल्थ पर असर

डायरेक्ट और रेगुलर प्लान्स के बीच चुनते समय, निवेशकों को लागत और प्रोफेशनल सर्विस के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। डायरेक्ट प्लान्स में डिस्ट्रीब्यूशन कमीशन नहीं लगता, इसलिए नेट रिटर्न ज्यादा मिलता है। उदाहरण के लिए, लार्ज-कैप इक्विटी फंड्स में, रेगुलर प्लान अक्सर डायरेक्ट प्लान से सालाना 1.1% से 1.2% पीछे रहता है।

20 साल के लंबे समय में यह अंतर काफी बड़ा हो जाता है। 19 जुलाई 2026 तक, अगर किसी ने डायरेक्ट प्लान में ₹1 लाख इन्वेस्ट किए होते, तो वह बढ़कर करीब ₹10.35 लाख हो जाते, जबकि रेगुलर प्लान में यह रकम सिर्फ ₹7.63 लाख ही होती। इससे पता चलता है कि एक्सपेंस रेशियो कंपाउंडिंग पर कितना असर डालता है।

रिटेल निवेशक वितरकों से क्यों जुड़े हैं?

डायरेक्ट प्लान्स के गणितीय फायदे के बावजूद, करीब 70% इंडिविजुअल कैपिटल अभी भी वितरकों के जरिए ही आ रही है। इसकी वजह है पर्सनल फाइनेंशियल गाइडेंस की जरूरत। आज के समय में इतने सारे म्यूचुअल फंड हाउस और स्कीम ऑप्शन्स के बीच, बहुत से रिटेल निवेशक अकेले अपना पोर्टफोलियो बनाना और मैनेज करना मुश्किल पाते हैं।

वितरक जरूरी सेवाएं देते हैं, जैसे - एसेट एलोकेशन स्ट्रैटेजी, पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग और मुश्किल मार्केट समय में बिहेवियरल कोचिंग। वेल्थ मैनेजमेंट का यह 'ह्यूमन एलिमेंट' छोटे शहरों में निवेश अपनाने का एक बड़ा कारण है, जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अभी मुख्य पसंद नहीं बन पाए हैं।

निवेश चैनलों में भौगोलिक रुझान

मार्केट डेटा निवेश के तरीकों में एक बड़ा भौगोलिक अंतर दिखाता है। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और अहमदाबाद जैसे बड़े और फाइनेंशियली डेवलप्ड शहरों में डायरेक्ट इनफ्लो का कंसंट्रेशन ज्यादा है, जो 80% से 90% तक है। इन जगहों पर कॉर्पोरेट और इंस्टीट्यूशनल ऑफिस ज्यादा हैं जो कॉस्ट-एफिशिएंसी को प्राथमिकता देते हैं।

इसके विपरीत, छोटे शहरों और कस्बों के निवेशक अभी भी इंटरमीडियरीज द्वारा दी जाने वाली पर्सनल रिलेशनशिप मैनेजमेंट सर्विस पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। जैसे-जैसे बचत का फाइनेंशियलाइजेशन भारत में और गहरा होता जाएगा, ये दो मॉडल - कम लागत वाली डिजिटल सेल्फ-सर्विस और सलाह-आधारित डिस्ट्रीब्यूशन - इंडस्ट्री के भविष्य के ग्रोथ को आकार देंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.