हाई-परफॉर्मिंग फैक्टर इंडेक्स के पीछे भागना पोर्टफोलियो के लिए नुकसानदायक हो सकता है क्योंकि बाजार के ट्रेंड बदलते रहते हैं। Nifty 200 Momentum 30 का डेटा बताता है कि टॉप परफॉर्मर भी अचानक गिर सकते हैं, जिससे टाइमिंग का खेल मुश्किल हो जाता है।
भारतीय निवेशक अब स्टैंडर्ड मार्केट बेंचमार्क को मात देने के लिए फैक्टर-बेस्ड इन्वेस्टिंग, जिसे 'स्मार्ट-बेटा' इंडेक्स भी कहा जाता है, की ओर रुख कर रहे हैं। ये फंड्स किसी कंपनी के साइज के बजाय मोमेंटम, वैल्यू या लो-वोलेटिलिटी जैसे खास लक्षणों के आधार पर स्टॉक चुनते हैं। हालांकि यह डाइवर्सिफिकेशन का एक अच्छा तरीका है, लेकिन हालिया विनर को देखकर निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है क्योंकि मार्केट लीडरशिप लगातार बदलती रहती है।
उतार-चढ़ाव का गणित
Nifty 200 Momentum 30 Index इसका एक बड़ा उदाहरण है। 2021 में 53% का शानदार रिटर्न देने के बाद, यह इंडेक्स 2022 में 5% गिर गया। 2023 और 2024 में तेजी के बाद, 2025 में फिर इसमें 5% की गिरावट देखने को मिली। ये झटके बताते हैं कि किसी फंड के अच्छा परफॉर्म करने के बाद उसमें पैसा लगाना कितना मुश्किल है। अक्सर जब तक निवेशक पैसा शिफ्ट करते हैं, तब तक साइकिल पीक पर होती है और मार्केट करेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।
पैसिव फंड्स को एक्टिव बेट न बनाएं
ICICI Prudential AMC के चिंतन हरिया के अनुसार, फैक्टर साइकिल कई सालों तक चल सकती है, जिससे यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कब एक ट्रेंड खत्म होगा और दूसरा शुरू। ट्रेंडी फंड्स के पीछे भागकर निवेशक अपने लॉन्ग-टर्म पैसिव पोर्टफोलियो को 'एक्टिव गैम्बल' में बदल देते हैं, जो अक्सर गलत समय पर होता है।
याद रखें कि Nifty 50 जैसे ट्रेडिशनल इंडेक्स मार्केट वैल्यू पर चलते हैं, जबकि फैक्टर इंडेक्स खास कैरेक्टरिस्टिक्स पर। वैल्यू-फोकस्ड इंडेक्स कई सालों तक मार्केट से कम रिटर्न दे सकते हैं, जैसा कि 2018 और 2019 में क्रमशः 18% और 9% की गिरावट के दौरान देखा गया था। एक स्मार्ट निवेशक वही है जो शॉर्ट-टर्म नंबर्स के बजाय अपनी लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल गोल्स पर फोकस करे और धैर्य बनाए रखे।
