FD से लिक्विड फंड्स की ओर क्यों भाग रहा है पैसा? जानिए असली वजह

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AuthorNeha Patil|Published at:
FD से लिक्विड फंड्स की ओर क्यों भाग रहा है पैसा? जानिए असली वजह
Overview

बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में रखा पैसा अब रिटेल निवेशक लिक्विड म्यूचुअल फंड्स में डाल रहे हैं। वजह है बेहतर यील्ड (Yield) और टैक्स में राहत। जहां FD महंगाई के मारे रिटर्न दे रही है और जल्दी पैसा निकालने पर भारी जुर्माना लग रहा है, वहीं लिक्विड फंड्स डेली लिक्विडिटी (Liquidity) और डायवर्सिफाइड मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स से अच्छे रिटर्न का मौका दे रहे हैं।

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क्यों बदल रहे हैं निवेशक अपना मन?

आम जनता से लेकर बड़ी कंपनियां तक, अब पारंपरिक सेविंग स्कीम्स की जगह लिक्विड म्यूचुअल फंड्स की तरफ रुख कर रही हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है कि बैंक डिपॉजिट, खासकर 90 दिन से कम अवधि वाले, महंगाई के मुकाबले फीके पड़ गए हैं। ऐसे में FD में पैसा फंसाए रखने का नुकसान साफ नजर आ रहा है।

असली रिटर्न पर महंगाई का ग्रहण

FD भले ही सुरक्षित मानी जाती हो, लेकिन बढ़ती महंगाई के दौर में यह आपके पोर्टफोलियो के लिए बोझ बन सकती है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि ₹3 करोड़ से कम की छोटी अवधि वाली FD पर मिलने वाला ब्याज, महंगाई दर से काफी कम है। FD की एक और बड़ी दिक्कत है टैक्स। इस पर मिलने वाले ब्याज पर तुरंत टैक्स देना पड़ता है, भले ही पैसा आपके हाथ में न आया हो। जबकि डेट म्यूचुअल फंड्स में टैक्स तभी लगता है जब आप अपना पैसा निकालते हैं। यानी कंपाउंडिंग (Compounding) का फायदा FD की तुलना में ज्यादा मिलता है।

लिक्विड फंड्स का ऑपरेशनल फायदा

लिक्विड फंड्स में ट्रेजरी बिल्स और कमर्शियल पेपर जैसे शॉर्ट-टर्म डेट इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल होता है। इससे ये इंटरेस्ट रेट (Interest Rate) के उतार-चढ़ाव से काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं। FD में जहां एक बार पैसा लॉक हो गया तो निकालने पर पेनल्टी लग सकती है, वहीं लिक्विड फंड्स में 7 दिन बाद आप आसानी से पैसा निकाल सकते हैं। इस अवधि के बाद तो पैसा लगभग तुरंत मिल जाता है। यह खासकर तब फायदेमंद है जब आपको अचानक पैसों की जरूरत पड़ जाए।

क्या है इसमें रिस्क?

यह समझना जरूरी है कि लिक्विड फंड्स में निवेश FD जितना 100% सुरक्षित नहीं है। बैंक डिपॉजिट पर सरकारी गारंटी या डिपॉजिट इंश्योरेंस (Deposit Insurance) का कवर मिलता है, लेकिन लिक्विड फंड्स मार्केट के भरोसे चलते हैं। हालांकि Axis, Edelweiss और DSP जैसी कंपनियां AAA-रेटेड डेट में ही निवेश करती हैं, पर अगर कभी कमर्शियल पेपर मार्केट में अचानक बड़ी क्रंच (Crunch) आ जाए तो फंड के NAV (Net Asset Value) पर असर पड़ सकता है। अगर अंडरलाइंग कमर्शियल पेपर की रेटिंग अचानक गिरती है, तो फंड में उतार-चढ़ाव आ सकता है। इसलिए, FD की तरह इन्हें पूरी तरह सेफ कैश (Cash Equivalent) तभी मानें जब आप थोड़े उतार-चढ़ाव के लिए तैयार हों।

आगे का अनुमान

जब तक यील्ड कर्व (Yield Curve) टाइट (Compressed) है, तब तक लिक्विड फंड्स की मांग बनी रहने की उम्मीद है। ब्रोकरेज फर्म्स का मानना है कि अगर बैंक अपनी शॉर्ट-टर्म FD की ब्याज दरों में बड़ा बदलाव नहीं करते, तो पैसा डेट म्यूचुअल फंड्स की ओर आता रहेगा। इस फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के बाकी समय में फंड्स के एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) और मनी मार्केट में क्रेडिट स्प्रेड्स (Credit Spreads) को मैनेज करने की क्षमता पर फोकस रहेगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.