टॉप 100 कंपनियों के बाहर निवेश करने वाले स्पेशल इक्विटी फंड्स में अगस्त के दौरान **₹2,433 करोड़** का जोरदार इनफ्लो दर्ज किया गया है। लॉन्ग-शॉर्ट स्ट्रैटेजी का इस्तेमाल करने वाले इन फंड्स का एसेट बेस अब **₹6,000 करोड़** के पार निकल चुका है।
टॉप 100 कंपनियों के बाहर निवेश करने वाले इन फंड्स का आकर्षण निवेशकों के बीच तेजी से बढ़ा है। केवल अगस्त महीने में इनमें ₹2,433 करोड़ की शुद्ध पूंजी आई है, जो लार्ज-कैप के बजाय मिड-कैप और स्मॉल-कैप की तरफ निवेशकों के बढ़ते झुकाव को दर्शाता है। अब इनका कुल एसेट बेस ₹6,000 करोड़ से भी अधिक हो गया है।\n\nइस निवेश लहर के पीछे की मुख्य वजह इनकी 'लॉन्ग-शॉर्ट' स्ट्रैटेजी है। साधारण म्यूचुअल फंड्स के उलट, ये फंड्स डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करके बाजार की गिरावट में भी मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं। निवेशक इनका चुनाव इसलिए कर रहे हैं ताकि छोटी कंपनियों के हाई-ग्रोथ शेयरों में एक्सपोजर के साथ-साथ हेजिंग के जरिए पूंजी की सुरक्षा भी की जा सके।\n\nइस दौरान स्मॉल-कैप म्यूचुअल फंड्स में ₹7,973 करोड़ और मिड-कैप फंड्स में करीब ₹7,000 करोड़ का निवेश हुआ है। स्पेशलाइज्ड फंड्स में आया यह पैसा इसी निवेश चक्र का हिस्सा है। ये मैनेजर्स उन कंपनियों पर दांव लगा रहे हैं जो अभी तक बड़े इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स की पहुंच से बाहर हैं।\n\nहालांकि, निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि ये फंड्स सामान्य ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड्स से अलग हैं। इनमें मिनिमम इन्वेस्टमेंट की सीमा ज्यादा होती है, फीस स्ट्रक्चर थोड़ा जटिल है और डेरिवेटिव ट्रेडिंग से जुड़े रिस्क भी इसमें शामिल हैं। अगर बाजार में अचानक कोई बड़ा उतार-चढ़ाव आता है, तो इन डेरिवेटिव दांवों से खर्च बढ़ने या अनपेक्षित नतीजे आने की संभावना बनी रहती है।\n\nभविष्य में, इन फंड्स की परफॉर्मेंस को अलग-अलग बाजार स्थितियों में देखना बहुत जरूरी होगा। निवेश करने से पहले इनके मैनेजमेंट फीस और ऐतिहासिक रिकॉर्ड की तुलना पारंपरिक इक्विटी फंड्स से जरूर कर लें ताकि यह आपकी रिस्क क्षमता के अनुकूल रहें।
