स्पेशलाइज्ड इन्वेस्टमेंट फंड्स (SIFs) ने अपने पहले साल में ही बाजार में अपनी धाक जमा ली है। इनका AUM अब **₹40,000 करोड़** के करीब पहुंच गया है। हालांकि, डेरिवेटिव्स के इस्तेमाल और जटिल रणनीतियों के कारण इनमें जोखिम भी ज्यादा है, जिसे निवेशकों को समझना बेहद जरूरी है।
भारत में अक्टूबर 2025 में पेश किए गए स्पेशलाइज्ड इन्वेस्टमेंट फंड्स (SIFs) की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। सितंबर 2026 तक इनका एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) लगभग ₹40,000 करोड़ के आंकड़े को छू चुका है। ये फंड्स पारंपरिक म्यूचुअल फंड्स और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के बीच की एक कड़ी की तरह काम करते हैं, जहां फंड मैनेजर्स को रणनीति और एसेट एलोकेशन में ज्यादा छूट मिलती है।
स्ट्रैटेजी और मिक्स
SIFs की इस ग्रोथ में 'हाइब्रिड लॉन्ग-शॉर्ट' रणनीतियों का दबदबा है, जो कुल AUM का 63 से 69 फीसदी हिस्सा कवर करती हैं। पारंपरिक म्यूचुअल फंड्स के उलट, SIFs को डेरिवेटिव्स के जरिए अपनी कुल संपत्ति का 25 फीसदी तक शॉर्ट एक्सपोजर लेने की अनुमति है। इससे मैनेजर्स को बाजार की गिरावट का फायदा उठाने या अपनी पोजीशन को हेज करने की आजादी मिलती है। फिलहाल, इस सेक्टर में केवल इक्विटी और हाइब्रिड प्रोडक्ट ही सक्रिय हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जटिल?
SIFs की फ्लेक्सिबिलिटी भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इनमें जोखिम भी है। सबसे बड़ा अंतर लिक्विडिटी का है; जहां म्यूचुअल फंड्स में डेली लिक्विडिटी मिलती है, वहीं SIFs में अक्सर पाक्षिक (fortnightly) या साप्ताहिक (weekly) रिडेम्पशन विंडो होती है। इसका मतलब है कि बाजार में दबाव के समय आप तुरंत पैसा नहीं निकाल पाएंगे।
इसके अलावा, इसमें एंट्री बैरियर काफी ऊंचा है। नियम के मुताबिक, एक निवेशक को कम से कम ₹10 लाख का निवेश करना अनिवार्य है। वित्तीय सलाहकारों का मानना है कि ये फंड्स केवल हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) या फैमिली ऑफिस के लिए उपयुक्त हैं, जिनका कुल पोर्टफोलियो कम से कम ₹70 लाख हो, ताकि SIF में किया गया निवेश उनके रिस्क प्रोफाइल के मुताबिक संतुलित रहे।
रिस्क और ड्यू डिलिजेंस
चूंकि ये फंड्स नए हैं, इसलिए इनके पिछले प्रदर्शन (Past Performance) पर पूरी तरह भरोसा करना सही नहीं होगा। इनका प्रदर्शन पूरी तरह से फंड मैनेजर की जटिल आर्बिट्रेज या लॉन्ग-शॉर्ट ट्रेड को चलाने की कुशलता पर निर्भर करता है। निवेश से पहले मैनेजर का ट्रैक रिकॉर्ड, डेरिवेटिव एक्सपोजर और फंड के एक्सपेंस स्ट्रक्चर की पूरी जांच-पड़ताल बहुत जरूरी है। याद रखें, कम रेगुलेशन के कारण इसमें पूंजी गंवाने का रिस्क पारंपरिक फंड्स की तुलना में अधिक है।
