साल 2026 के जुलाई महीने तक, स्मॉल और मिडकैप (SMID) म्यूच्यूअल फंड्स ने इक्विटी पोर्टफोलियो के **30%** हिस्से पर कब्जा कर लिया है। यह 2022 में **19%** था। जहां इंडेक्स में शानदार रिटर्न की वजह से इनकी पॉपुलैरिटी बढ़ी है, वहीं निवेशक अब इन हाई-ग्रोथ सेगमेंट्स में बढ़ी हुई वैल्यूएशन (Valuation) और लिक्विडिटी (Liquidity) के जोखिमों को भी समझ रहे हैं।
भारतीय इक्विटी पोर्टफोलियो में बड़ा बदलाव
भारतीय इक्विटी पोर्टफोलियो की तस्वीर बदल रही है। जुलाई 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, स्मॉल और मिडकैप (SMID) फंड्स अब कुल एक्टिव इक्विटी फोलियो का लगभग 30% हिस्सा बन गए हैं। यानी, इंडस्ट्री के कुल 18.73 करोड़ खातों में से 5.5 करोड़ खाते इन फंड्स के हैं। यह जुलाई 2022 के 19% शेयर से एक बड़ी बढ़ोतरी है। यह दिखाता है कि निवेशक अब बड़े कैप (Large-cap) फंड्स की जगह हाई-ग्रोथ वाले स्मॉल और मिडकैप सेगमेंट को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं।
शानदार इंडेक्स रिटर्न की भूमिका
स्मॉल और मिडकैप फंड्स की यह बढ़ोतरी स्टॉक मार्केट में इन सेगमेंट्स के शानदार प्रदर्शन से सीधे जुड़ी है। मौजूदा फाइनेंशियल ईयर (FY2027) में अगस्त तक, Nifty Smallcap 100 इंडेक्स 31% चढ़ा है, और Nifty Midcap 100 इंडेक्स ने 22% का रिटर्न दिया है। इन दोनों ने Nifty50 इंडेक्स को पीछे छोड़ दिया, जिसने इसी दौरान सिर्फ 9% का रिटर्न दिया। जुलाई 2026 में, स्मॉल-कैप फंड्स में रिकॉर्ड ₹7,768 करोड़ का नेट इनफ्लो (Net Inflow) आया। इससे पता चलता है कि निवेशक जोखिमों के बावजूद इन कैटेगरी में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं।
लार्ज-कैप से दूरी, स्मॉल-कैप की ओर झुकाव
इसके विपरीत, लार्ज-कैप सेगमेंट, जिसमें स्थापित और स्थिर कंपनियां शामिल हैं, में जुलाई 2026 के दौरान पिछले 30 महीनों में पहली बार नेट आउटफ्लो (Net Outflow) देखा गया। यह डेटा इशारा करता है कि कई निवेशक अब छोटी कंपनियों में पैसा लगा रहे हैं, उन्हें उम्मीद है कि ये कंपनियां तेजी से बढ़ेंगी।
छिपे हुए जोखिम: वैल्यूएशन और लिक्विडिटी
हालांकि, इस बढ़ती पॉपुलैरिटी के साथ कुछ बड़े जोखिम भी जुड़े हैं, जिन्हें निवेशकों को समझना चाहिए। सबसे बड़ी चिंता इन स्टॉक्स की मौजूदा वैल्यूएशन (Valuation) है। अगस्त 2026 की शुरुआत में, Nifty Smallcap 100 इंडेक्स का प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेशियो 32.24 था। यह अपने 5-साल के औसत से लगभग 11% ज्यादा है। ऊंची वैल्यूएशन का मतलब है कि निवेशक इन एसेट्स के लिए ज्यादा प्रीमियम चुका रहे हैं। अगर कमाई उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी, तो पोर्टफोलियो में बड़ी गिरावट का खतरा बढ़ सकता है।
एक और बड़ा जोखिम लिक्विडिटी (Liquidity) का है। स्मॉल-कैप स्टॉक्स में आमतौर पर ट्रेडिंग वॉल्यूम (Trading Volume) लार्ज-कैप स्टॉक्स की तुलना में कम होता है। ऐसे में, अगर बड़ी संख्या में निवेशक एक साथ अपने पैसे निकालना चाहें, तो फंड मैनेजर्स को इन अंडरलाइंग स्टॉक्स को कीमत पर ज्यादा असर डाले बिना जल्दी बेचने में मुश्किल हो सकती है। रेगुलेटरी स्ट्रेस टेस्ट (Regulatory Stress Test) से यह भी पता चला है कि मार्केट में गिरावट के दौरान इन पोर्टफोलियो को लिक्विडेट (Liquidate) करने में मिड-कैप या लार्ज-कैप होल्डिंग्स की तुलना में काफी ज्यादा समय लग सकता है।
आगे क्या?
निवेशकों के लिए, अगला महत्वपूर्ण पहलू यह देखना होगा कि मार्केट में दबाव के दौरान ये फंड्स कैसा प्रदर्शन करते हैं। फंड मैनेजर्स ताजे पैसे को बिना ज्यादा कीमत दिए प्रभावी ढंग से कैसे निवेश करते हैं, और क्या छोटी कंपनियों की असली प्रॉफिट ग्रोथ मौजूदा वैल्यूएशन प्रीमियम को बनाए रख पाएगी, यह देखना अहम होगा। जैसे-जैसे इन फंड्स का साइज बढ़ रहा है, फंड हाउसेज के लिए पोर्टफोलियो की क्वालिटी और लिक्विडिटी बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।
