भारतीय Small-Cap म्यूचुअल फंड्स ने अपने पोर्टफोलियो को लिक्विडेट (Liquidation) करने के औसत समय को घटाकर **11.9 दिन** कर लिया है, जो साल की शुरुआत में **18.8 दिन** था। हालांकि, बाजार के जानकारों का कहना है कि ये आंकड़े थ्योरेटिकल हैं और बाजार में गिरावट के दौरान स्थिति बदल सकती है।
आंकड़ों में सुधार की असली वजह
सितंबर के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, स्मॉल-कैप फंड्स को अपना आधा पोर्टफोलियो बेचने में अब 11.9 दिन का समय लग रहा है। वहीं, पोर्टफोलियो का एक-चौथाई हिस्सा बेचने का समय घटकर 6.2 दिन रह गया है, जो जनवरी में 9.6 दिन हुआ करता था। इस सुधार का मुख्य कारण बाजार में बढ़ी हुई ट्रेडिंग वॉल्यूम है। अप्रैल से सितंबर के बीच Nifty Smallcap 250 इंडेक्स में शामिल शेयरों का औसत डेली ट्रेडेड वैल्यू 21% बढ़कर ₹25,440 करोड़ तक पहुंच गया है।
क्या है इसमें जोखिम?
Association of Mutual Funds in India (AMFI) की ओर से जारी ये स्ट्रेस टेस्ट आंकड़े पारदर्शिता के लिए हैं, लेकिन इन्हें अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए। ये आंकड़े मौजूदा बाजार वॉल्यूम पर आधारित हैं। हकीकत में, बाजार में गिरावट के दौरान लिक्विडिटी गायब हो जाती है। यदि भारी संख्या में निवेशक पैसा निकालने (Redemption) का दबाव बनाते हैं, तो फंड हाउस को मजबूरन कम कीमतों पर शेयर बेचने पड़ सकते हैं। इससे फंड की NAV में गिरावट आती है, जो निवेशकों के लिए बड़ा झटका हो सकता है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि स्मॉल-कैप में निवेश केवल उन निवेशकों के लिए है जिनका नजरिया लंबा है। इन स्ट्रेस टेस्ट मेट्रिक्स को एक गाइड की तरह देखें, गारंटी की तरह नहीं, क्योंकि स्मॉल-कैप फंड्स बाजार के उतार-चढ़ाव के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं।
