साल 2026 में एक्टिव स्मॉल-कैप म्यूचुअल फंड्स ने Nifty Smallcap 250 इंडेक्स को पीछे छोड़ते हुए शानदार प्रदर्शन किया है। जहां इन फंड्स का औसत रिटर्न **15.5%** रहा, वहीं इंडेक्स सिर्फ **9.88%** का रिटर्न ही दे पाया।
स्मॉल-कैप सेगमेंट में एक्टिव फंड मैनेजर्स और पैसिव इंडेक्स स्ट्रैटेजी के बीच प्रदर्शन का बड़ा अंतर देखने को मिला है। यह ट्रेंड बताता है कि मार्केट रिकवरी के समय एक्टिव मैनेजमेंट किस तरह बेहतर ग्रोथ को कैप्चर कर सकता है।
क्यों पीछे रह गए पैसिव फंड्स?
पैसिव फंड्स इंडेक्स को कॉपी करते हैं, जो एक सस्ता विकल्प जरूर है, लेकिन इनकी सबसे बड़ी कमजोरी Nifty Smallcap 250 का छमाही (biannual) रीबैलेंसिंग शेड्यूल है। इस लैग (lag) के कारण, इंडेक्स में शामिल खराब कंपनियों के शेयर भी निवेशकों के पोर्टफोलियो में 6 महीने तक बने रहते हैं। इसके विपरीत, एक्टिव मैनेजर्स के पास ओवरवैल्यूड स्टॉक्स से निकलने की आजादी होती है। साल 2025 की गिरावट के दौरान, जहां इंडेक्स में 6.01% की गिरावट आई थी, वहीं एक्टिव फंड्स केवल 4.5% ही नीचे गिरे थे।
फंड मैनेजर का चुनाव है असली खेल
हालांकि एक्टिव फंड्स बेहतर रिटर्न दे रहे हैं, लेकिन यहां मैनेजर्स के प्रदर्शन में भारी अंतर भी है। साल 2026 में टॉप और बॉटम परफॉर्मिंग फंड्स के बीच 30.5% का अंतर रहा। सबसे बेहतर फंड्स ने 32% का रिटर्न दिया, जबकि सबसे खराब फंड्स सिर्फ 1.5% पर सिमट गए।
निवेशकों के लिए सलाह
केवल शॉर्ट-टर्म रिटर्न को देखकर निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है। निवेशकों को फंड के लॉन्ग-टर्म रिस्क-एडजस्टेड मेट्रिक्स पर ध्यान देना चाहिए। यह देखें कि बाजार की गिरावट में फंड मैनेजर ने रिस्क को कैसे मैनेज किया। स्मॉल-कैप में लगातार परफॉर्मेंस की उम्मीद रखने के बजाय, फंड मैनेजर की 'रिस्क और ग्रोथ' को बैलेंस करने की क्षमता को प्राथमिकता दें।
