SEBI ने Mutual Funds द्वारा IPO में की जा रही आक्रामक निवेश रणनीति पर लगाम लगाने की तैयारी कर ली है। रेगुलेटर यह जांच रहा है कि क्या ये फंड्स **2026** के नए नियमों के तहत निवेशकों के रिस्क प्रोफाइल के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
एंकर इन्वेस्टर्स की भूमिका पर सवाल
म्यूचुअल फंड कंपनियां अक्सर IPO में 'एंकर इन्वेस्टर' के तौर पर भाग लेती हैं, जिससे उन्हें लिस्टिंग से एक दिन पहले ही शेयर अलॉट हो जाते हैं। हालांकि, रेगुलेटर ने पाया है कि कई फंड हाउस लिस्टिंग के तुरंत बाद ही इन शेयरों को बेचकर बाहर निकल रहे हैं। यह रणनीति शॉर्ट-टर्म मुनाफे के लिए तो ठीक हो सकती है, लेकिन यह उन रिटेल निवेशकों के भरोसे के खिलाफ है जो लंबी अवधि के लक्ष्य के साथ पैसा लगाते हैं। 2026 के नियमों के मुताबिक, अब फंड मैनेजर्स को अपने निवेश के उद्देश्यों (Investment Mandates) पर टिके रहना अनिवार्य है।
रिटेल निवेशकों के लिए क्या है जोखिम?
जब कोई फंड अपना पैसा किसी अस्थिर (Volatile) नए स्टॉक में लगाता है, तो इसका सीधा असर आपके निवेश की नेट एसेट वैल्यू यानी NAV पर पड़ता है। इससे फंड के परफॉर्मेंस में अचानक उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। इसके अलावा, एक ही फंड हाउस की अलग-अलग स्कीम्स का एक ही जोखिम वाले शेयरों में निवेश होने से 'कॉन्सेंट्रेशन रिस्क' भी बढ़ जाता है। SEBI अब यह सुनिश्चित करना चाहता है कि एक साधारण डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड में पैसा लगाने वाला निवेशक अनजाने में किसी वेंचर-स्टाइल या हाई-रिस्क वाली स्कीम के जाल में न फंसे।
निवेशकों को अब क्या करना चाहिए?
अपनी गाढ़ी कमाई सुरक्षित रखने के लिए अब केवल रिटर्न के आंकड़ों को न देखें। एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) द्वारा जारी किए जाने वाले 'मंथली फैक्टशीट्स' पर नजर रखना जरूरी है। इससे आपको पता चलेगा कि आपका पैसा किन नई कंपनियों के IPO में फंसा है और कितना निवेश स्थापित कंपनियों में है। रेगुलेशन के इस दौर में, अनुशासन ही निवेशकों के लिए सबसे बड़ा हथियार है।
