रेगुलेटर की समीक्षा और इंडस्ट्री की चिंताएं
SEBI ने म्यूच्युअल फंड इंडस्ट्री के लिए हाल ही में जारी किए गए कुछ अहम निर्देशों पर इंडस्ट्री से मिली प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी समीक्षा शुरू कर दी है। यह कदम फंड हाउसेज की उन चिंताओं के बाद उठाया गया है, जिनमें सॉल्यूशन-ओरिएंटेड स्कीम्स को बंद करने और नए लाइफसाइकल फंड्स को लेकर उनके अपने तर्क हैं। SEBI के चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने संकेत दिए हैं कि रेगुलेटर इंडस्ट्री की बात सुनेगा, जिससे यह उम्मीद जगी है कि पहले जारी किए गए निर्देशों में कुछ बदलाव हो सकते हैं।
सॉल्यूशन-ओरिएंटेड स्कीम्स पर टैक्स का बोझ
फंड मैनेजमेंट कंपनियों ने SEBI को बताया है कि मौजूदा सॉल्यूशन-ओरिएंटेड स्कीम्स को बंद करके दूसरी कैटेगरी में मर्ज करने से निवेशकों पर टैक्स का भारी बोझ पड़ सकता है। इसके अलावा, इन बदलावों से उनके ऑपरेशंस में भी बड़ी दिक्कतें आ सकती हैं, जैसे कि एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) का एडजस्टमेंट और मौजूदा फंड जुटाने की प्रक्रिया पर असर। इंडस्ट्री बॉडी AMFI भी इस मामले में SEBI के साथ सक्रिय रूप से जुड़ी हुई है।
लाइफसाइकल फंड्स की टैक्स-एफिशिएंसी और फ्लेक्सिबिलिटी पर सवाल
नए लाइफसाइकल फंड्स, जिनमें 5 से 30 साल की अवधि में शेयरों में निवेश (Equity) एक्सपोजर को ऑटोमैटिकली कम किया जाता है, को लेकर भी काफी बहस छिड़ी हुई है। भारत में शेयरों और डेट (Debt) इंस्ट्रूमेंट्स पर अलग-अलग टैक्स लगता है। ऐसे में, जब ये फंड शेयरों से डेट की ओर बढ़ते हैं, तो यह देखना अहम होगा कि क्या ये निवेशकों के लिए लंबे समय में टैक्स एफिशिएंट (Tax Efficient) होंगे। इंडस्ट्री का एक वर्ग यह भी मानता है कि इन फंड्स के तयशुदा 'ग्लाइड पाथ' (Glide Path) के कारण इनमें फ्लेक्सिबिलिटी (Flexibility) की कमी होगी, जो कि पारंपरिक रूप से फाइनेंशियल एडवाइजर्स (Financial Advisors) का काम होता है।
इंडस्ट्री का बढ़ता दबदबा और बाजार की प्रतिक्रिया
यह सब तब हो रहा है जब भारतीय म्यूच्युअल फंड इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है। जनवरी 2026 तक इंडस्ट्री का टोटल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) लगभग ₹81.01 लाख करोड़ तक पहुंच गया था। रिटेल निवेशकों की भागीदारी भी बढ़ी है, दिसंबर 2025 तक 5.90 करोड़ से ज्यादा निवेशक हो गए थे। SIP (Systematic Investment Plan) इनफ्लो भी मजबूत बना हुआ है, जो जनवरी 2026 में ₹31,002 करोड़ रहा। हालांकि, 26 फरवरी 2026 को लाइफसाइकल फंड्स और पोर्टफोलियो ओवरलैप (Portfolio Overlap) पर सख़्त नियम जैसे नए रेगुलेटरी बदलावों की घोषणा के बाद एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) के शेयरों में गिरावट आई थी।
संभावित नुकसान और अनिश्चितता
अगर SEBI अपने फैसले पर कायम रहता है, तो मौजूदा सॉल्यूशन-ओरिएंटेड स्कीम्स को बंद करने से निवेशकों को भारी कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) देना पड़ सकता है। वहीं, लाइफसाइकल फंड्स टैक्स के मामले में कम प्रभावी साबित हो सकते हैं, क्योंकि वे लंबे समय में डायरेक्ट शेयरों या डायवर्सिफाइड डेट फंड्स की तुलना में कम रिटर्न दे सकते हैं, खासकर टैक्स-सचेत निवेशकों के लिए। इनकी फिक्स्ड 'ग्लाइड पाथ' बाजार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार एडजस्ट नहीं हो पाती, जिससे निवेशक अपनी जरूरत के हिसाब से स्ट्रैटेजी नहीं बना पाते।