अप्रैल **2026** से लागू हुए SEBI के 'Reset 2.0' फ्रेमवर्क ने म्यूचुअल फंड की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब नए एक्सपेंस रेशियो मॉडल, कड़े ओवरलैप लिमिट्स और एसेट एलोकेशन के नए नियम निवेशकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं।
बाजार में बड़ा बदलाव
भारत के इक्विटी म्यूचुअल फंड बाजार के लिए 1 अप्रैल 2026 एक ऐतिहासिक तारीख रही है, जब से SEBI ने 'Reset 2.0' को लागू किया है। इस बदलाव का मुख्य मकसद म्यूचुअल फंड हाउसों में पारदर्शिता बढ़ाना और स्कीमों के दोहराव को रोकना है, ताकि निवेशक वही पाएं जो उन्हें स्कीम के नाम पर बताया गया है।
पोर्टफोलियो ओवरलैप पर लगाम
सबसे अहम बदलाव सेक्टरल और थीमेटिक फंडों में 50% की पोर्टफोलियो ओवरलैप लिमिट है। इसका मतलब यह है कि फंड हाउस अब अलग-अलग नाम से एक जैसे स्टॉक्स वाले फंड नहीं चला पाएंगे। इससे निवेशकों को बेहतर डाइवर्सिफिकेशन मिलेगा और एक जैसी स्कीमों के लिए बार-बार फीस देने का जोखिम खत्म हो जाएगा।
नई एसेट एलोकेशन की आजादी
अब फंड मैनेजरों को इक्विटी और हाइब्रिड फंडों में 35% तक का हिस्सा गोल्ड, सिल्वर और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs) जैसे अल्टरनेटिव एसेट्स में निवेश करने की छूट मिल गई है। यह कदम बाजार की उठापटक (Volatility) से निपटने के लिए उठाया गया है, हालांकि इससे फंड का रिस्क प्रोफाइल भी बदल गया है।
खर्चों की नई परिभाषा (BER मॉडल)
अब टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) की जगह बेस एक्सपेंस रेशियो (BER) लागू हो गया है। इसमें मैनेजमेंट फीस और स्टैच्युटरी चार्जेस को अलग-अलग दिखाया जाएगा, जिससे निवेशकों को पता चलेगा कि असली लागत क्या है। हालांकि, शुरुआत में निवेशकों को पुरानी और नई लागतों की तुलना करने में थोड़ी उलझन हो सकती है।
लाइफ साइकिल फंड की शुरुआत
रिटायरमेंट और बच्चों की पढ़ाई जैसे पुराने गोल-आधारित फंड अब बंद कर दिए गए हैं। इनकी जगह अब 'लाइफ साइकिल फंड' ने ले ली है, जो निवेशक के लक्ष्य के करीब आने पर अपने आप इक्विटी और डेट के बैलेंस को 'ग्लाइड-पाथ' (Glide-path) के जरिए एडजस्ट करते रहते हैं।
अब निवेशकों को क्या करना चाहिए?
अप्रैल 2026 के बाद से कई फंडों के मैंडेट बदल गए हैं। निवेशकों को सलाह है कि वे अपने पोर्टफोलियो का ऑडिट करें। यह देखें कि कहीं आपके फंड रीक्लासिफाई तो नहीं हुए हैं और क्या मौजूदा होल्डिंग्स अन्य फंडों के साथ बहुत ज्यादा ओवरलैप तो नहीं कर रही हैं।
