SEBI ने अब म्यूचुअल फंड हाउसों को यह छूट दे दी है कि वे अपने इक्विटी स्कीमों में Gold और Silver ETF को शामिल कर सकते हैं। अप्रैल 2026 से प्रभावी हुए इस बदलाव का मकसद मार्केट की अस्थिरता के दौरान पोर्टफोलियो को मजबूती देना है, हालांकि यह फंड हाउसों के लिए पूरी तरह वैकल्पिक है।
भारतीय बाजार के रेग्युलेटर SEBI ने म्यूचुअल फंड मैनेजर्स के लिए एक नया विकल्प पेश किया है। 1 अप्रैल, 2026 से नॉन-डेब्ट एक्टिव म्यूचुअल फंड स्कीमों को गोल्ड और सिल्वर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETF) में निवेश करने की अनुमति मिल गई है। इससे अब फंड हाउस जरूरत पड़ने पर पोर्टफोलियो का एक हिस्सा कीमती धातुओं में लगा सकेंगे, जो शेयर बाजार की भारी गिरावट या अनिश्चितता के दौर में एक 'हेज' (Hedge) के रूप में काम करेगा।
यह अनिवार्य नहीं, सिर्फ एक विकल्प है
निवेशकों को यह समझना होगा कि SEBI ने कोई अनिवार्यता लागू नहीं की है। यह फंड मैनेजर की मर्जी पर निर्भर है कि वे कब और कितना गोल्ड या सिल्वर पोर्टफोलियो में जोड़ना चाहते हैं। कुछ फंड हाउसों ने अपने स्कीम डॉक्यूमेंट्स में बदलाव भी कर लिया है। जहां कुछ स्कीम्स ने 10% तक एक्सपोजर की सीमा तय की है, वहीं कुछ फ्लेक्सीकैप फंड्स ने 35% तक का दायरा रखा है ताकि जरूरत पड़ने पर कमोडिटी में निवेश बढ़ाया जा सके।
वैल्यूएशन और कीमतों में बदलाव
इस नए नियम के साथ वैल्यूएशन का तरीका भी बदल गया है। पहले फंड्स अक्सर 'लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन' (LBMA) के बेंचमार्क को फॉलो करते थे, लेकिन अब भारतीय बाजार में उपलब्ध घरेलू स्पॉट प्राइसेस का उपयोग किया जाएगा। इससे भारतीय निवेशकों को स्थानीय बाजार के अनुकूल कीमतें मिलेंगी, हालांकि कभी-कभी ग्लोबल कमोडिटी ट्रेंड्स से इसमें मामूली अंतर दिख सकता है।
जोखिम और सावधानी
गोल्ड और सिल्वर में निवेश पोर्टफोलियो को डाइवर्सिफाई जरूर करता है, लेकिन इसके अपने जोखिम भी हैं। गोल्ड और सिल्वर की कीमतें ग्लोबल मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर्स और करेंसी उतार-चढ़ाव से तय होती हैं, जो हमेशा शेयर बाजार के साथ नहीं चलतीं। विशेष रूप से चांदी (Silver) में सोने की तुलना में ज्यादा वोलेटिलिटी होती है, क्योंकि इसका उपयोग औद्योगिक कार्यों में भी होता है। यदि औद्योगिक मांग घटती है, तो चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट आ सकती है।
निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे अपने फंड हाउस द्वारा जारी लेटेस्ट 'फैक्ट शीट' या 'स्कीम इंफॉर्मेशन डॉक्यूमेंट' को जरूर देखें। इससे पता चलेगा कि आपकी स्कीम ने इस नए विकल्प को अपनाया है या नहीं और उन्होंने कमोडिटी एक्सपोजर की क्या सीमा तय की है।
