SEBI का बड़ा कदम! इंडेक्स फंड्स और ETFs पर लग सकती हैं सीमाएं, निवेशकों को होगा फायदा

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AuthorNeha Patil|Published at:
SEBI का बड़ा कदम! इंडेक्स फंड्स और ETFs पर लग सकती हैं सीमाएं, निवेशकों को होगा फायदा

मार्केट रेगुलेटर SEBI, एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) द्वारा लॉन्च किए जाने वाले पैसिव म्यूचुअल फंड्स (जैसे ETFs और इंडेक्स फंड्स) की संख्या पर सीमाएं लगाने पर विचार कर रहा है। इस कदम का मकसद ओवरलैपिंग प्रोडक्ट्स की बढ़ती संख्या को रोकना और रिटेल निवेशकों के लिए कंफ्यूजन को कम करना है। फिलहाल, पैसिव फंड्स की कुल संपत्ति ₹15.5 ट्रिलियन तक पहुंच गई है, जो इंडस्ट्री की कुल संपत्ति का 18% है।

क्यों लग सकती हैं सीमाएं?

सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) पैसिव म्यूचुअल फंड स्कीम्स की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने के लिए नए नियमों पर शुरुआती चर्चा कर रहा है। रेगुलेटर को इंडेक्स फंड्स और एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) के तेजी से प्रसार पर चिंता है, जो अक्सर एक जैसी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी पेश करते हैं। इससे रिटेल निवेशकों को सही प्रोडक्ट चुनने में मुश्किल हो सकती है।

पैसिव फंड्स का बढ़ता दबदबा

पैसिव फंड्स का मुख्य उद्देश्य किसी खास मार्केट इंडेक्स के प्रदर्शन को ट्रैक करना होता है, न कि उससे बेहतर प्रदर्शन करना। इनकी लोकप्रियता में जबरदस्त उछाल आया है, और इस सेगमेंट में एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर ₹15.5 ट्रिलियन हो गया है। यह भारतीय म्यूचुअल फंड की कुल संपत्ति का 18% है, जो मार्च 2021 में 10.2% था। पिछले साल अकेले 130 से ज्यादा पैसिव फंड लॉन्च किए गए, जबकि 86 नए एक्टिव फंड पेश किए गए।

AMCs की नई स्ट्रेटेजी

एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) ने कई तरह के पैसिव प्रोडक्ट्स लॉन्च किए हैं, जिनमें मोमेंटम या वैल्यू जैसे अलग-अलग फैक्टर्स पर आधारित फंड्स या इक्वल-वेट एलोकेशन वाले फंड्स शामिल हैं। उदाहरण के लिए, SBI म्यूचुअल फंड, ICICI प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड और HDFC म्यूचुअल फंड जैसे बड़े प्लेयर्स ने अलग-अलग मार्केट सेगमेंट्स को टारगेट करने के लिए कई फैक्टर-बेस्ड ETFs और इंडेक्स फंड्स पेश किए हैं। हालांकि इससे निवेशकों को ज्यादा विकल्प मिले हैं, लेकिन यह एक ऐसी मार्केट का निर्माण कर रहा है जो ऐसे फंड्स से भरी पड़ी है जो हाई ओवरलैपिंग स्टॉक होल्डिंग्स वाले इंडेक्स को ट्रैक करते हैं।

एक्सपर्ट्स की राय

कुछ इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने फंड्स की संख्या पर सख्त कैप लगाने को लेकर सावधानी जताई है। उनकी चिंता है कि ऐसे नियम प्रोडक्ट की रिडंडेंसी (redundancy) की समस्या को पूरी तरह से हल नहीं कर पाएंगे। उदाहरण के लिए, अगर स्टैंडर्ड इंडेक्स फंड्स पर कैप लगाया जाता है, तो AMCs संभावित रूप से सीमित संख्या से बचने के लिए तेजी से छोटे या कम लिक्विड इंडेक्स को ट्रैक करने वाले फंड्स लॉन्च कर सकते हैं। आलोचकों का सुझाव है कि रेगुलेटर को सिर्फ फंड्स की संख्या के बजाय खुद इंडेक्स की क्वालिटी और उनके पीछे के लॉजिक पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

यह विचार SEBI द्वारा 2026 की शुरुआत में पब्लिक के लिए इन्वेस्टमेंट विकल्पों को सरल बनाने के उद्देश्य से सेक्टरल और थीमैटिक एक्टिव इक्विटी स्कीम्स में पोर्टफोलियो ओवरलैप को रोकने के बाद आया है। चूंकि ये चर्चाएं अभी शुरुआती दौर में हैं, निवेशकों को रेगुलेटर से किसी भी आधिकारिक कंसल्टेशन पेपर या सर्कुलर पर नजर रखनी चाहिए, जिससे यह स्पष्ट होगा कि संभावित सीमाएं कैसे संरचित की जाएंगी और मौजूदा व नए फंड ऑफर्स पर कैसे लागू होंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.