SEBI ने पोर्टफोलियो मैनेजर्स के जरिए म्यूचुअल फंड में निवेश (PRIM) का नया रास्ता खोल दिया है। अब **₹25 लाख** तक की निवेश राशि वाले निवेशक भी प्रोफेशनल एक्सपर्ट्स की सेवाएं ले सकेंगे, जिसकी फीस **1%** तक सीमित रखी गई है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने 24 सितंबर, 2026 को 'पोर्टफोलियो मैनेजर्स रूट फॉर इन्वेस्टिंग इन म्यूचुअल फंड यूनिट्स' (PRIM) को हरी झंडी दे दी है। यह नया फ्रेमवर्क उन निवेशकों के लिए लाया गया है जो DIY (डू-इट-योरसेल्फ) और महंगे PMS (पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज) के बीच एक संतुलित रास्ता तलाश रहे थे।
नए नियमों के मुताबिक, ₹25 लाख की न्यूनतम पूंजी वाले निवेशक एक पोर्टफोलियो मैनेजर को नियुक्त कर सकते हैं। ये मैनेजर डायरेक्ट म्यूचुअल फंड, ETFs, इंडेक्स फंड और SIFs (स्पेशलाइज्ड इन्वेस्टमेंट फंड्स) के जरिए आपका पैसा मैनेज करेंगे।
कॉस्ट स्ट्रक्चर को समझें
SEBI ने इसके लिए सालाना मैनेजमेंट फीस को 1% की कैप के साथ तय किया है। हालांकि, निवेशकों को 'कॉस्ट स्टैकिंग' के प्रति सतर्क रहना होगा। चूंकि आपका पोर्टफोलियो मैनेजर म्यूचुअल फंड स्कीमों में निवेश करेगा, तो आपको मैनेजर की फीस के अलावा उन फंड्स का एक्सपेंस रेशियो भी देना होगा। इस तरह कुल लागत बढ़ सकती है, जो इंडेक्स फंड्स की तुलना में महंगी साबित हो सकती है।
रिस्क और सावधानी
सबसे बड़ा रिस्क 'कंसंट्रेशन रिस्क' है। चूंकि SIFs में एक स्कीम के लिए कम से कम ₹10 लाख निवेश करने होते हैं, इसलिए ₹25 लाख के पोर्टफोलियो में विविधता लाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में पैसा एक या दो फंड हाउस में ही सिमट कर रह सकता है।
हितों के टकराव (Conflict of interest) को रोकने के लिए, SEBI ने ग्रुप कंपनियों की स्कीमों में निवेश की सीमा 25% तय कर दी है। साथ ही, मैनेजरों को अपने PRIM कारोबार को डिस्ट्रीब्यूशन बिजनेस से पूरी तरह अलग रखना होगा। फिलहाल निवेशकों को अंतिम सर्कुलर और टैक्स नियमों का इंतजार करना चाहिए ताकि वे यह तय कर सकें कि क्या यह प्रोफेशनल फीस उनके निवेश पर मिलने वाले रिटर्न के लिहाज से सही है या नहीं।
