भारतीय रिटेल निवेशकों के लिए विदेशी बाजारों में निवेश करना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। साल 2008 में तय की गई म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री की **$7 बिलियन** की लिमिट पूरी तरह से भर चुकी है, जिससे आम निवेशकों के विकल्प सीमित हो गए हैं।
भारत के म्यूचुअल फंड सेक्टर में विदेशी निवेश को लेकर बने नियमों की अब फिर से समीक्षा की मांग उठ रही है। साल 2008 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने ओवरसीज म्यूचुअल फंड निवेश के लिए $7 बिलियन और विदेशी ETF के लिए $1 बिलियन की सामूहिक सीमा तय की थी। उस समय यह कदम विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए उठाया गया था, लेकिन आज भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹80 ट्रिलियन के पार पहुंच चुके हैं।
क्यों बंद हो जाते हैं नए निवेश?
जब यह सामूहिक सीमा खत्म हो जाती है, तो फंड हाउस फ्रेश सब्सक्रिप्शन लेना बंद कर देते हैं। इसका सीधा असर छोटे निवेशकों पर पड़ता है, जो ग्लोबल इक्विटी या थीमैटिक फंड्स में पैसा लगाना चाहते हैं। फिलहाल, अमीर निवेशक तो LRS (Liberalised Remittance Scheme) या GIFT City के जरिए निवेश कर लेते हैं, लेकिन मध्यम वर्ग के निवेशकों के लिए ये रास्ते जटिल और महंगे हैं।
क्या है नया समाधान?
अब एक्सपर्ट्स यह मांग कर रहे हैं कि सामूहिक सीमा (Industry-wide Cap) के बजाय व्यक्तिगत सीमा (Individual-based Limit) तय की जाए। सुझाव यह है कि हर व्यक्ति को सालाना $10,000 तक के निवेश की छूट दी जानी चाहिए। PAN और आधार कार्ड के जरिए अब निवेशकों की मॉनिटरिंग करना आसान है, जिससे सरकार के लिए कैपिटल आउटफ्लो पर नजर रखना तकनीकी रूप से मुमकिन है।
यह बदलाव न केवल निवेशकों को पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन का मौका देगा, बल्कि ग्लोबल मार्केट की ग्रोथ से भी उन्हें सीधे जोड़ेगा। देखना दिलचस्प होगा कि RBI इस बढ़ती मांग पर कब तक कोई बड़ा फैसला लेता है।
